विज्ञान और आध्यात्म की समानान्तर यात्रा
वैज्ञानिक एक ऐसे सूत्र को ढूंढ रहे हैं जिसकी मदद से ब्रह्मांड की सभी प्रक्रियाओं को जोड़ा जा सके। भौतिकी में चार प्रकार के बल बताए गए हैं। गुरुत्वाकर्षण, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक, स्ट्रोंग न्यूक्लियर और वीक न्यूक्लियर। ये सभी पदार्थ की विभिन्न प्रक्रियाओं के लिए जिम्मेदार हैं।
अणु के भीतर प्रोटोन और न्यूक्लोन में अंतिम दो पाए जाते हैं जो विपरीत प्रकृति के हैं। गुरुत्वाकर्षण काफी दूर तक परंतु काफी मंद है तो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक भी कुछ इसी प्रकार परंतु थोड़ी दूर के लिए तथा अधिक शक्तिशाली। ये सभी हैं एक ही मात्र दूरी और शक्ति की भिन्नता से पदार्थ में कार्य कर रहे हैं।
वैज्ञानिक इन्हें जोड़ने वाले एक सूत्र की तलाश में हैं जिससे वे सृष्टि की शुरुवात के घटनाक्रम को समझ सकें। वे भी बड़ी रोचक बात कहते हैं कि समय की शुरुवात बिग बैंग से हुई। तो उससे पहले क्या था? अब जब समय ही एक विशेष बिंदू पर टिका है तो उससे पहले उसका अस्तित्व भी कैसे स्वीकारा जाए। बस यहां पर वैज्ञानिक अटक जाते हैं।
परंतु वे रुकते नहीं क्योंकि तर्क का अंत नहीं होता है। उनकी तलाश जारी है। आखिर उनकी तलाश है किस प्रकार की? वे सृष्टि रचियता को जानना चाहते हैं। जब तक सूत्र रूप में जवाब नहीं मिल जाता तब तक वे ईश्वर के अस्तित्व पर खामोश हैं। कई उसे नकारते हैं तो कई स्वीकार करते हैं।
एक अन्य पहेली वैज्ञानिकों के समक्ष है। वह है कि ब्रह्मांड में जो कुछ दृष्टिगोचर होता है वह उस अदृश्य भाग की तुलना में बहुत कम है जिसे उन्होंने डार्क मैटर या डार्क एनर्जी कहा है। अब वैज्ञानिकों की बातें भारतीय दर्शन से काफी मिलती जुलती हैं। जैसे शून्यता का प्रतिपादन बौद्ध दर्शन में चित्त का प्रकाशित होना दिखाया गया है जब बुद्धि पूर्ण निर्मल हो जाए।
अपने अनुभव में योगी यह देख पाते हैं कि जो व्यक्त है उसकी तुलना में जो अव्यक्त है वह असीम है। उनके लिए अस्तित्व स्थूल, सूक्ष्म, शून्य, शिव में बंटा हुआ है। इसे उपनिषदों में वर्णित शब्द की चार अवस्थाओं बैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा से भी जोड़ा जा सकता है। वैज्ञानिक अपने तर्क से अस्तित्व को जोड़ना चाहते हैं तो योगी उसे एक धागे में पिरोए मणियों की तरह देखते हैं।
वे ' यथा ब्रह्मांडे तथा पिंडे ' की उक्ति को स्वीकार करते हैं। जो जानने योग्य है वह वैज्ञानिक के लिए अपने मन में, बाह्य संसार में है तो योगी के लिए मन, इन्द्रियों के व्यापार से परे है। शायद यही एक के बहिर्मुखी रहने तथा दूसरे के अतंर्मुखी रहने का कारण है।
वैसे दोनों अपनी यात्रा पर आगे बढ़ रहे हैं। एक दिन वह अवश्य आएगा जब विज्ञान अपनी पहेली को सुलझा लेगा तथा आध्यात्म सुलझी हुई दृष्टि से प्रगति करता चलेगा।
© सिद्धार्थ राणा
