Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·13·

सब्ज़बाग

लहरों के मौजों ने सोचों कितने दर्द छुपाए होंगे, मिलन को आतुर बाहों ने कितने दृश्य बनाए होंगें ।

हँसी-खेल हैं जीवन सारा सपनों से बाजार भरे हैं , अंतसमन में झांक के देखो कितने किरदार निभाए होंगें।

दुनियाँ के दहलीज़ पर कोलाहल की होड़ हैं , अंदर-बाहर एक नहीं जो होठों पे प्यार सजाए होंगें।

रात की चौथी पहर से मिलिए आत्मसात का बोध हैं , यूं तो सारी रात आँखों ने अनगिनत सब्ज़बाग दिखाए होंगें।

©#कुमार