सब्ज़बाग
लहरों के मौजों ने सोचों कितने दर्द छुपाए होंगे, मिलन को आतुर बाहों ने कितने दृश्य बनाए होंगें ।
हँसी-खेल हैं जीवन सारा सपनों से बाजार भरे हैं , अंतसमन में झांक के देखो कितने किरदार निभाए होंगें।
दुनियाँ के दहलीज़ पर कोलाहल की होड़ हैं , अंदर-बाहर एक नहीं जो होठों पे प्यार सजाए होंगें।
रात की चौथी पहर से मिलिए आत्मसात का बोध हैं , यूं तो सारी रात आँखों ने अनगिनत सब्ज़बाग दिखाए होंगें।
©#कुमार
