Siddharth Rana
Siddharth RanaCourseLiteraturePoetry
11 Feb 2021·2 min read·

जीवनी शक्ति का विकास

योग जीवनी शक्ति का विकास है। चित्त के संस्कार हटाए नहीं जा सकते परंतु परिवर्तित किये जा सकते हैं। प्रवृत्ति और निवृत्ति में जिसने उसे देख लिया जो परिवर्तनशील नहीं परन्तु सभी परिवर्तन जिसकी परिक्रमा कर रहे हैं तो वह योग को प्राप्त हो जाता है। मात्र समाधि का प्रयास योग नहीं परन्तु क्षण क्षण हमारे पास जो आत्मिक प्रगति का अवसर है उसके प्रति खुला रहना है। व्यक्ति का मूल हमेशा उसके आवरणों से दबा रहता है।

मात्र मूल तक जाने की इच्छा में उसकी प्रगति नहीं परन्तु मूल में रहने की तीवृ उत्कंठा ही वह श्रेय मार्ग दिखाती है जिसका वर्णन उपनिषद करते हैं। जब कोई मूल के प्रेम को अनुभव करता है तो उसे वैसा ही कुछ संसार में देखने की इच्छा होती है। संसार में वह भगवान को ही देख रहा है पर मलीनता उसे चुभती है जैसे कोई अपने ही बदन पर सुइं चुभते हुवे देख रहा हो। यह दुनिया जिसे हम संसार कहते हैं क्योंकि फंस जाते हैं वास्तव में भगवान की प्रतिमूर्ति है।

बिखरा तो वह ही है पर उसे देखने की दृष्टि बर्हिमुखी नहीं अंतर्मुखी है। हम अपनी आत्मा की प्रगति दूसरों को उठाने में देखें तो इसे आत्म विस्तार कहेंगे। यदि अपने तक ही सीमित हो जाएंगे तो आत्म हनन के भागी होंगे। वैसे तो अध्यात्म पथिक की संसार से कोई वैयक्तिक इच्छा नहीं परन्तु जब कुछ ऐसा नजर आए जो अपने भीतर बर्दास्त नहीं वह बदलने की तीव्र उत्कंठा दृष्टिगोचर होती है। यह विचार उस व्यवहार पर उठ रहे हैं जो आदमी अपने को आम कहते हुवे प्रकट करता है।

क्यों समाज में कोई ऊंचा है तो कोई नीचा। किसी को सर्वत्र एकता के स्थान पर भेद ही नजर आते हैं। हम अपने वातावरण से प्रभावित हो उसी के रंग में घुल जाते हैं पर अपना रंग तो परमात्मा है उसे विस्मित क्यों कर देते हैं। लोगों से योग की बात करो तो वे कहते हैं कि जमाना ऐसा नहीं कोई गौतम बुद्ध नहीं, विवेकानंद नहीं, इसा मसीह नहीं। अरे नहीं है तो यही तो बदलना है।

हर व्यक्ति अपनी दिव्यता को छुपाए है तथा एक समान ही है। महानता बाह्य नहीं अन्तर्जगत की बात है परन्तु अन्तर्जगत तो बहुत बड़ा मजाक है। वहां जाना यानी अहम को टूटते हुए देखना। बर्फ में छोटा सा भी छेद हो जाए तो पूरी ही दरार आ जाएगी और जो उसका आधार है वह दिख जाएगा पर वह पहली शुरुवात ही सबसे कठिन है। भौतिक वादियों के समक्ष अपनी वाणी कुंठित भले ही हो सकती है पर वह पहली शुरुवात सत्य की यात्रा की दुर्लभ है।

भगवान मेरे देश को आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक स्तर पर इतना आत्मनिर्भर बनाए कि जो आत्मविजय का लक्ष्य इस भूमि के ऋषियों ने हमारे समक्ष रखा उस ओर बढ़ने में सहायता हो। ईश्वर की दी हुई शक्ति को बिखरा देना उन कार्यों में जिनका आत्मा से तो नहीं पर अहम से बड़ा नाता है दुख देता है परन्तु आम आदमी तो रोटी, कपड़ा, मकान ही चाहता है।

इससे बढ़कर कोई लक्ष्य वह स्वीकारना नहीं चाहता परंतु टाल जरूर देता है। यह वह तनाव पैदा करता है जो समाज में अपराध, भ्रष्टाचार, असामनता को जन्म देता है। इस देश की शक्ति अध्यात्मिक है भौतिक नहीं वह तो इसके साधन मात्र हैं जिन उद्देश्यों को हम सर्वोपरि मान बैठे हैं साध्य नहीं।

© सिद्धार्थ राणा