मैं समाधि मेंं हूँ !
नहीं चाहता था स्वयं को खोलना तुम्हारे सामने, लेकिन वर्षों बाद मिला एकांत, खुल गई गांठें(संकल्प) क्या मैं समाधि मेंं हूँ।
श्वांस-प्रश्वांस के तारतम्य मेंं बार-बार मन का हस्तक्षेप बुद्धि में एक बिंदु की परिकल्पना और एकांत की पुनः रचना क्या मैं समाधि में हूँ!
मन के हस्तक्षेप से श्वांस-प्रश्वांस का आलोड़न भारहीनता के आग्रह मेंं एक बिंदु को पकड़े रहने की लालसा और एकांत की अभीप्सा क्या मैं समाधि में हूँ!
एकांत के परिवर्तित परिदृश्य में मन बुद्धि का तिरोहन, हो रहा यात्रा अंतः की एक निर्द्वंद्व अनुगूंज का सम्मोहन, प्रशांतकाम प्रशांतचित्त क्या बताऊँ अब मित्र आधि-व्याधि या समाधि में हूँ!
©#रंजीत
