Siddharth Rana
Siddharth RanaCourseLiteraturePoetry
9 Feb 2021·1 min read·

अहिंसा अस्त्र

योगी का सबसे बड़ा अस्त्र अहिंसा होती है। अहिंसा शब्द उसके समग्र व्यवहार का परिचायक होता है। हम किसी से बात करते हैं तो एक तरह से अपने से ही बात कर रहे हैं। उसके लिए क्या उपयुक्त क्या नहीं यह अपने आप ही हममें परिलक्षित हो जाता है यदि हम राग द्वेष से परे रहना सीख जाएं। आज मानव अपनी पीड़ा को गहराई से अनुभव नहीं करना चाहता।

किसी के उस दुख को देख जो छिपा है बड़ी पीड़ा होती है। मनुष्य बदलता रहता है कभी वही मनुष्य हमें बुरा लगता है तो कभी अच्छा। वास्तव में मनुष्य बुरा नहीं उसके दुर्गुण बुरे हैं। वह एक इसलिए नहीं क्योंकि आध्यात्म पथ पर चलना नहीं चाहता। यही आम आदमी के जीवन में दिखता है। वह अपने को आम मान बैठा है अपने बच्चों के हित की चिंता में, अपनी अधूरी आकांक्षाओं में या अपने दुर्गुणों को दूर न कर पाने में।

यदि हर व्यक्ति आत्मकेंद्रित होता तथा संसार के सभी भोगों को इस आत्मा के लिए स्वीकार करता तो कहना पड़ता कि दुनिया एक उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ रही है। वह उज्ज्वल भविष्य बाहर नहीं हमारे भीतर ही है। आत्म गरिमा को आज कौन महत्व दे रहा है। यदि मात्र यह याद रखा होता कि हमारा जन्म सब के लिए है तो भी लगता कि आम कहलाते हुए भी आदमी खास ही है। परंतु सांसारिक प्रलोभन उसे अहिंसा और सत्य के पथ से विमुख कर देते हैं।

अहिंसा यानी आत्मा के विपरीत आचरण न करना तथा सत्य उस पर अडिग रहना है। जब तक अपनी कोमलता का परिचय नहीं मिलता तब तक दूसरों में भी वह नहीं दिखती है। हम मांस खाएं तथा अपने बच्चों की जिंदगी संवारने में लगे रहें यह करुणा नहीं लोभ है। जीवन के हर पक्ष में एक सी दृष्टि रख पाना जो आदर्शों पर आधारित हो ही आत्मिक उत्कर्ष की सीढ़ी है।

© सिद्धार्थ राणा