Siddharth Rana
Siddharth RanaCourseLiteraturePoetry
9 Feb 2021·2 min read·1·

ॐ शांति: शान्ति: शांति: का अर्थ

उपनिषदों में अंत में ॐ शांति: शान्ति: शांति: लिखा मिलता है। इसका क्या अर्थ है? हम पूजा में जो भी कृत्य करते हैं उनके लिए ऋषियों ने अर्थ चिंतन भी दिया है जैसे आचमन, शिखा वंदन, प्राणायाम, न्यास आदि क्रियाएं पंच कर्मेंद्रियों, पंच ज्ञानेंद्रियों, पांच प्राण आदि की शुद्धि करती हैं। इसी प्रकार ॐ की ध्वनि के साथ ' शांति ' शब्द को तीन बार दोहराना भी चिंतन के साथ होना चाहिए।

ॐ वह है जिसमें सभी धाराएं समा जाएं। वह सागर है सबसे नीचे रहता है। जब हम इस अस्तित्व के समक्ष झुकते हैं तो यही भावना होती है कि हम कुछ नहीं जो है वह यह अस्तित्व ही है। यह अहं शून्यता सागर में ही हो सकती है तथा झुककर हम सागर ही हो जाते हैं। अंत में जहां हमें मिलना है वह हम ही हैं। हम चलते फिरते सागर हैं। ध्वनि भी वही है जो उसके अर्थ में स्पष्ट होता है।

' ॐ शांति ' यानी ॐ ही शांति है, ॐ ही वह शांति है जो सभी वृत्तियों से गुजर भी परिवर्तित नहीं होती। भारतीय संस्कृति में ॐ का महत्व इतना अधिक है कि सभी मंत्रों की शुरुवात इसी से की जाती है। गीता में भगवान कृष्ण इसी के जप को प्राथमिकता देते हैं। इस संसार में विचरण करते हुए हमें ही निर्णय लेना है कि हम भगवान के साथ हैं या उनसे विपरीत।

इससे बड़ी साझेदारी क्या हो सकती है कि सुख दुख, मान अपमान में द्वंदों से गुजर भी भग्वन के साथ रहें। यह समर्पण ही तो हमारी संस्कृति का आधार है। हमारी संस्कृति कहती है कि अपने स्वरूप को पहचान अपने को नीचे गिरने न दो, उस असीमता से जुड़ो जो संसार की तुच्छता से कहीं ऊपर है, जहां त्याग, प्रेम, समर्पण है।

नीचे गिरते हैं तो भगवान के साथ नहीं रह जाते, ॐकार के साथ नहीं रह जाते फिर तो दास ही बन जाते हैं। जीवन एक युद्ध है इसे भली भांति जान भगवान की ओर से लड़ने की ठानी जाए।

© सिद्धार्थ राणा