तकनीक का आनंद
वर्तमान समाज में तकनीकी का हस्तक्षेप इतना बढ़ गया है कि बिना इसके एक दिन भी जीना दूभर सा हो गया है।खासकर नई पीढ़ी जिसमें युवा और बच्चे ने तो इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स (मोबाईल, टैब, लैपि, टेलीविज़न, आदि ) को अपना सबकुछ ही मान लिया है। जैसे- त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धु च सखा त्वमेव, त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं ममः देवदेव ।
अर्थात:- तुम्हीं माता हो, तुम्हीं पिता हो,तुम्हीं भाई हो,तुम्हीं साथी हो,तुम्हीं विद्या हो,तुम्हीं धन हो, तुम्हीं सब कुछ हो,और परमात्मा भी तुम्हीं हो।
मैं ऐसा इस आधार पर कह रहा हूँ कि देखने में आता है एक ही परिवार के सदस्य इन गैजेट्स में ऐसे खोये रहते है, कि वे घर में आए मेहमान का अभिवादन करने में अपने आप को असहज महसूस करते।
अपने-अपने कमरे में या अपने-अपने बेड पर बैठे-बैठे वे न जाने कितने दूर के अपने दोस्तों या परिजनों से चैट कर रहे होते है लेकिन अपने पास बैठे अपने स्वजनों से एक शब्द भी नहीं बोलते।कोई पहल भी करता है बात करने का तो उन्हें यह कहकर फटकार देते कि अभी मैं बीजी हूँ मुझे डिसटर्ब मत किया करो।
ऐसा कभी-कभार या एक-दो दिन नहीं हुआ करता बल्कि हमेशा ऐसा ही आलम बना रहता है।शोध से यह बात जाहीर हुई है कि तकनीक ने न्यूक्लियर फैमिली बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
लोग संयुक्त परिवार के साथ समय बिताने के बजाय इन गैजेट्स पर अपना समय बिताना अच्छा समझने लगे है।घर की महिलाएँ टीवी सीरियल में, बच्चे गेम और कार्टून में ,युवा वर्ग सोशल एप्पस में उलझे रहते है।जो लोग इन सबसे लगाव नहीं रखते उन्हें आऊटडेटेड समझा जाता है।उनका मज़ाक भी उड़ाया जाता और ताने भी सुनाये जाते।
बसों में ,ट्रेनों में ,पैदल या अपने निजी वाहनों में सफ़र कर रहे लोगों को कभी नजर उठाकर देखिये।80 प्रतिशत लोग किसी न किसी इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स में उलझे नजर आएंगे।डॉक्टरों का कहना है कि इन इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स का अधिक उपयोग मानसिक रोग के मरीजों कि संख्या बढ़ा रहा है।
शहर ,गाँव,जंगल,पहाड़ किसी को भी इस तकनीकी जंजाल ने नहीं छोड़ा है।बच्चे कम समय में वयस्क हो रहे है ,युवावर्ग संगीन अपराधों में लिप्त हो रहे है।तकनीकी वरदान के तुलना में अभिशाप बन गया है ।जैसे-
- अस्त-व्यस्त जिन्दगी,
- अकेलेपन का ऐहसास,
- किसी काम में मन नहीं लगना,
- कल्पनाशीलता में कमी आना,
- रोमांचकता में कमी,
- निर्णय लेने में देरी,
- कार्यान्वयन (Implementation) में कमी,
- जीने की इच्छा न करना,
- आत्महत्या कर लेना,आदि-आदि समस्याएँ आम हो गयी है।
गूगल तो अल्लादीन के चराग की तरह है, बस आप इसे हुक्म दो और यह आपके सामने समाधान हाज़िर कर देगा। चाहे रेसिपी हो या अपने सामान की मार्केटिंग सब का समाधान ‘गूगल जिन्न’ के पास है। ख़ुशी से लोग इसे ‘गूगल अंकल’ और ‘गूगल दादा’ भी कहते है।
मैं तकनीक को गाली नहीं दे रहा हूँ।न ही यह कह रहा हूँ की तकनीकी ने हमारी जिंदगी को मटियामेट करके रख दिया है,हमें अस्त-व्यस्त और कमजोर बना दिया है।
तकनीकी वरदान भी है यदि इसे सही तरीके से उपयोग किया जाय।तकनीक कि बजह से ही हम चाँद और मंगल ग्रह पर जा सके है।इलेक्ट्रोनिक गैजेट्स के सहारे ही हम परदेसों में काम करने गये और वहाँ रह रहे अपने दिल के टुकड़ों से बात कर पाते है।हवाई यात्रा भी तकनीक का ही परिणाम है,जिससे जरूरत पड़ने पर हम मीलों तक का सफर मिनटों में तय कर अपने गंतव्य तक पहुँच पाते है।
मेरा कहना है कि तकनीकी वरदान बने और ऐसा तभी हो पाएगा जब तकनीक का-
- समय-पाबंद उपयोग किया जाये,
- हम अपनों से फेस-टू-फेस बात करें,
- हम अपनी रचनात्मकता को बढ़ाएँ
- हम प्रकृति से जुडें।
यदि लोग स्वयं के प्रति जागरूक रहे तो तकनीक को वरदान में बदला जा सकता है, और जीवन का आनंद लिया जा सकता है।
©#नरेन्द्र प्रसाद निराला
