हमारी पहचान
जब जब मैंने फूलों को छूने की कोशिश की, काँटों ने हमको रोक लिया। जब जब मै अपने राहों में बढने की कोशिश की, कंकड़ों ने हमे रोक लिया।
कभी अपने ही कांटे बने, तो कभी अपने ही कंकड बन कर हमको रोक लिया।
मैं मुसाफिर हूँ यारों चलना मेरा काम है, रोक सके न कोई हमको यही हमारी पहचान है।
चलने का मजा भी तभी आता है, जब अपने ही कांटे और अपने ही कंकड़ हो।
जब इनको भी हम पार कर जायेंगे, तो मंजिल अपने आप मिल जायेगी।
राहो मे काँटे कंकड बहुत मिलेंगे, लेकिन इनसे घबरा जाना हमारी फितरत में नहीं।
जो काँटे आ रहे है राहों में उनको भी तुम खामोश करो, बता दो उन काँटों को, इतने हम कायर नहीं।
जब हम मंजिल को पा जायेगे , तो काँटों को भी हम कुछ नया सिखा जायेंगे। । न रोक सके हमे ये काँटे, न हम कभी रुकेंगे।
मै मुसाफिर हूँ यारों चलना मेरा काम है। कोई रोक सके न हमे यही हमारी पहचान है। । ©#अमरेश गिरि
