दशरथ मांझी
तीन सौ साठ फीट लम्बा तीस फीट चौड़ा और ऊंचा पच्चीस फीट, बस छेनी-हथौड़ी साथ पर था गुमां अपने हाथ बाईस साल तक झेला टीस !
प्यार का जब भी उसने घूंट पिया। 'पर्वत पुरूष' होने का भान दिया ।।
शायद थी वो फगुनिया के चूड़ियों की खनक और पायल की रुनझुन, जिसके लिए उठा लिया जज़्बे ने एक छेनी-हथौड़ी जिसे खरीदा था बकरी बेचकर !
था सभ्यता के विकास का सबसे बड़ा रोड़ा। तुम्हारी सुनहरी यादों ने जो मारा हथौड़ा।।
पहाड़ को था जो गुमान तो अपना भी ये स्वाभिमान पीर पराई ना अब बहने देंगे दर्द ना ये औरों को सहने देंगे तू रस्ता दे दे गहलौर पहाड़ वरना देंगे तेरा सीना चीर !
जज्बे ने अतरी-वजीरगंज की दूरी। पचपन से पंद्रह किलोमीटर किया।।
तुम्हारे नाम से ही जीवंत होती रहेगी बर्बर दौर में प्रेम की संकल्पनाएं, पीढ़ियों तक देंगे खूशबू पथरीली घाटी में लगाए तुम्हारे नन्हें औजारों की विधाएं !
इतिहास में हैं दर्ज मनुज की हर गाथाएं। तुम्हें समर्पित अदम्य संघर्ष की ये कथाएं।।
दशरथ मांझी सिर्फ नाम नहीं इंसानी जज़्बे और जुनून की मिसाल है, जिसकी दीवानगी और ज़िद से बना प्रेम पथ ताजमहल से भी विशाल हैं !
जिसने रास्ता रोका, उसे ही काट दिया। प्यार में फ़ना होकर एक परवाना जीया।।
©कुमार
