लालकिला और आश्वासन
लाल किले को दिया आपने सिर्फ ईंट-गारो का मान, पर, हमारे लिए तो वो हैं आज भी पूरा हिदुस्तान !
आज तक न खरे उतरे खुद पे कृपानिधान, कैसे करें तब आमजन आपकी बातों का सम्मान !
पिछले बरस ही तो भेजी थी हमारे गांव को एक अदद नहर, वो तो आपके वादों सा ही ढाह रहे हमपे नित नए कहर !
और, इस साल फिर आपने भेज दी इक नदी, भला कैसे नहीं डूबेंगे इसमें हमारे गांव - शहर !
जब मिली नदी-नहर से तो दोनों ही रो पड़े, बोले की लाल किले अब कैसे-कैसे शौक फरमाएंगे !
पहले प्यासी जनता को नदी-नहर में भेद समझाएंगे, फिर, बहाकर उल्टी धारा हमें सालों तक भरमाएंगे !
अब गांव वाले कैसे भला दोनों का बोझ उठाएंगे, सरकारी कर्ज़ों की जीवटता तो ये तनिक न सह पाएंगे !
भला अब कौन हमारे प्यास बुझाने आएंगे, 74 वर्षों से प्यासे गांववाले प्यासे ही मर जाएंगे !
©कुमार
