चलो आज फिर
चलो आज फिर खेतों में पतंग उड़ाते है इठलाते है,गुनगुनाते है।
पुरानी गलियों में जाकर कंचों का लुत्फ़ उठाते है।
कलकतिया खजुर के पेडों को डोलकर खजुर का आनंद उठाते है।
मेंढक को लगाकर सूई और चीरा खुद को डॉक्टर बनाते है।
पानी से भरे तालाब में दो चार पत्थर लगाकर झूठी पूरी पकाते हैं।
नुका छिपाई में,छिपकर चोरों को खूब गुड़ाते है।
चलो आज फिर गिल्ली डंडा का लुत्फ़ उठाते है।
©अमन कुमार(विक्की)
