Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·1·

वारिश की बूंदे

वारिश अपने रूआब पर है, छिंट जाती बूंद खुशियों वाली। बादल सब एक समान छाया, उड़ेल रही नीर की भेली। मस्ती छायी चहुंओर, छींट रही बूंदे खुशियों वाली।

मदमस्त हुए बैठे, ताके जा रहे बस। इन खूबसूरती वाली बरसात, इतराती खुमार भर के। कितनी सुहानी है, ये दिन आज के।

मेघ गर्जन करती, कह रही मानो। नींद की तंदरा, मदमस्ती की कंदरा से बाहर निकल तू। लिख दे, कर दे कुछ नया, नई इबारत गढूं।

गढ़ दू एक नए जीवन की आगाज, नई शुरुआत। संशय का ऊहाफोह खत्म कर, नए इमारत की तकिर करे। छींटें हम पे आ जाए, डाल देती खुमार खुशियों वाली।

पानी की बूंदें, कुछ कहती अपनी कहानी। मिलो की यात्रा, जैसे क्षण में तय किए। इथला रही, उमंग से लेवरेज, मदमस्त कर रही हमे।

जीवन की बूंदे, निकल पड़ी एक धाल की ओर। वारिश अपने रूआब पर है, छिंट जाती बूंद खुशियों वाली। बादल सब एक समान छाया, उड़ेल रही नीर की भेली। मस्ती छायी चहुंओर, छींट रही बूंदे खुशियों वाली।।

#वारिशबुंदी

©#मिथिलेश कुमार