Siddharth Rana
Siddharth RanaCourseLiteraturePoetry
9 Feb 2021·1 min read·

आध्यात्मवादी भौतिकता

हमारी शिक्षा व्यवस्था क्यों हमें नौकर बना रही है। उसमें मात्र पैसे को इतना महत्व दिया जा रहा है कि पैसा ही भगवान बन गया है। हमारे हृदय खुले नहीं हैं क्योंकि इच्छाओं की पूर्ति नहीं हुई है तथा हमारी हंसी हमारी वास्तविकता को नहीं दर्शाती।

व्यक्ति शक्ति चाहता है पर शांति नहीं, वर्चस्व चाहता है पर आत्मविस्तार नहीं, जड़ता चाहता है पर सुधार नहीं। हमारे सपने कितने दूर के हैं तथा जीवन कितना करीब है। किसी विशेष प्रकार ही जीवन का आनंद नहीं मिलता बल्कि जीवन स्वयं आनंद है। कहीं एक बहुत सुंदर शब्द पढ़ा था 'आध्यात्मवादी भौतिकता'। यह आज के युग के संदर्भ में काफी उपयुक्त है।

कोई व्यक्ति अध्यापक, कलाकार, अफसर कुछ भी हो यदि अपने कार्य को कर्तव्य की भांति देखे तो उसे किसी भी परिस्थिति में उस कार्य से विमुखता न होगी। आज हो यह रहा है कि कार्य बोझ बन गया है क्योंकि हमें बहुत कुछ संभालना है। भगवान राम ने इतना कष्टमय जीवन स्वीकार किया, किसी भी परिस्थिति में उनका मन बाधा न बना, मर्यादाओं को पाल वे जीवन को जीते हुए भी उससे ऊपर रहे।

हम जल की भांति हैं जिस बर्तन में डालो वही रूप रंग ले लेता है परन्तु रहता जल ही है। प्रेम मन की सतह से नहीं काफी गहराई से होता है। सतह पर हमारी पदवी है जिसे कोई प्रेम करता है तो कोई मजबूरी में है। लोग कहते तो हैं की वे अपने कार्य को प्रेम करते हैं पर यह तो उन्हें सिखाया गया है कि अपने कार्य से प्रेम करो। सच्चा प्रेम किसी से होता नहीं परन्तु वह तो हमारा स्वभाव है।