बदलाव और आशावाद की विजय
लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट की राजग की सरकार की पहल को उत्तर-पूर्व की जनता ने स्वीकार कर अपना जनादेश दे दिया। जब प्रधानमंत्री ने लुक ईस्ट से एक्ट ईस्ट का नारा दिया था तब राजनीतिक पंडित इसे मात्र एक बदले हुए नारे के रुप में ही इसे देख रहे थे,जिसके पीछे का सच केवल इतना सा था कि उत्तर पूर्व और वहाँ के लोग जो अपने को भारत जैसे गणराज्य से मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक दोनों रूपों से अपने को अलग मानते है ,उनके इस मान्यता को कभी भी किसी सरकार ने इतनी गंभीरता नही दिखाई, जितनी कि राजग सरकार ने दिखाई। उनका सबसे पहला निर्णय इस दिशा में अगर कहा जाय तो केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के रूप में किरण रिजीजू को मंत्री बनाने का था।
2014 में जब दिल्ली में उत्तर पूर्व के लोग जो अधिकतर दक्षिणी दिल्ली के मुनिरका, बेर सराय, नेब सराय, कालू सराय और अन्य जगहों पर रहते है, उनपर लगातार हमले होते थे, कही भाषाई समस्या तो कही, खान-पान की विविधिता के कारण कोई समस्या इस हद तक बढ़ जाती की बात हमले और कई बार तो हत्या जैसी गंभीर अपराध तक बात बढ़ जाती। इन सबके कारण इन लोगो मे एक असुरक्षा का माहौल उत्पन्न हो गया था,इन लोगो को एक खास शब्द से सम्बोधित किया जाता था,पर नेता वही जो दूर की भाप ले किरण रिजीजू को मंत्री बनाकर 14 में ही मोदीजी ने 18 के विजय की नींव रख दी थी,उन्हें सुरक्षा का वातावरण देकर,उनके बीच मे उनके ही बीच का आदमी अब उनकी सबसे बड़ी समस्या असुरक्षा को दूर करने वाला मुखिया बना था,ये उनके मनोवैज्ञानिक संबल का आधार था।
उसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस दिशा में कई प्रयास किये, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री ने बीजेपी मुख्यालय पर उत्तर-पूर्व विजय की शुभकामना में भी किया। राजग दिल्ली से विश्वाश का माहौल बनाकर पूरे उत्तर भारत को साध रही थी, इसके साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हजारों कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर वहाँ के लोगो को समझने में लगे थे, जो काम एक समय कांग्रेस के सेवा दल के लोग करते थे ,जिसके अंतिम हस्ताक्षर के रूप में स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री थे,जिन्हें नेहरूजी ने सेवा के दौरान ही अपनी पारखी नजर से देखा और उस सेवा दल के सेवक को हीरे के रूप में परिणत कर दिया।
आज कांग्रेस प्रगतिशिलता के चक्कर मे गांव ,घर ,जमीन जो कभी कांग्रेस की आत्मा हुआ करते थे ,उनको लगभग भूल चुकी है, वही बीजेपी के पास मोदी के रूप में एक चिंतक,राजनीति का ऐसा माहिर खिलाड़ी मिल चुका है जिसे जब हजारों स्वयंसेवकों की अनवरत श्रम साधना की ताकत मिल जाती है तो उनकी अपराजेयता पर कोई प्रश्नचिन्ह नही लग सकता। निश्चित ही ये विजय 'बदलाव और आशावाद की विजय है',वामपंथ के नाम पर चाय की चुस्कियों के साथ दिल्ली में सेमिनार करने वाले वामपंथी जब बस्तर, सुकमा में सड़क और स्कूल को उड़ा देने के पक्ष में नक्सलियों के पक्ष में तर्क गढ़ते है,तो बड़ा ही विचित्र लगता है।
हाथों में राडो की घड़ी पहनकर , सैटेलाइट फ़ोन और विदेश में पढ़ने वाले अपने बच्चों से जब ये बौद्धिक लोग बहस करते है तो सुदूर ढलते सूरज का अंतिम सलाम 'लाल सलाम' के बीच आदिवासियों के बच्चे जब निराश हताश से अपने होने के एहसास को ही लगभग खत्म मान चुके ये बच्चे ,इनका कौन जिम्मेदार है ? हमें इन बदलावों को स्वीकार करना होगा, विकास की बात करनी ही होगी,और अब जब बात निकली है तो दूर तक तो जायेगी ही,एक बार फिर लाल सूरज जो क्रोध का प्रतीक है डूबने को है !
