आम आदमी का जीवन दर्शन
नीरव मोदी, विजय माल्या की तरह आम जनता भी अनजाने में चर्वाक दर्शन के अनुयायी हो गये । क्योंकि इस भौतिकवादी दर्शन के अनुसार कहा गया है- यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ अर्थात - जब तक जीना चाहिये सुख से जीना चाहिये, अगर अपने पास साधन नहीं है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये, शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है ?
अधिकतर भारतीय अपने मासिक आय का दो तिहाई से ज्यादा खर्च बच्चों के शिक्षा पर करते है,स्वास्थ्य जैसे आपातकालीन समस्या व्यक्ति को गरीब बनने पर मजबूर कर देता है । परिणामस्वरूप ये अपने भाई,बहन,दोस्त या अन्य रिश्तेदारों, साहुकार अथवा बैंक से कर्ज लेकर अपनी जरूरत पूरा करने को बेबस होता है । किसी ने सच ही कहा है कि एक भारतीय कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज में जीता है और कर्ज में ही मर जाता है ।
वही बिल गेट्स का कहना है कि गरीब पैदा लेना शर्म की बात नहीं है, लेकिन गरीब रहकर मर जाना शर्म की बात है । यह आशावादी दृष्टिकोण है, जिसे अपनाकर पुरुषार्थ करना चाहिए, जिससे इतनी आय बढ़े कि दूसरों को मदद कर सके । बिल गेट्स , मार्क ज़करबर्ग इत्यादि जैसे कई ऐसे लोग हमारे आसपास होंगे, जिन्होंने अपनी संपत्ति का अधिकतर हिस्सा लोगों के भलाई के लिए दान कर दिया है ।
इसलिए कबीर दास जी ने कहा है - साँई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय ।
©#नरेन्द्र प्रसाद निराला
