प्रिय विकास तुम लौट भी आओ
प्रिय विकास तुम लौट भी आओ
ईपीएल भी आ गया अब तो आकर जरा हमें बहलाओ ? दुनियां बदल गई हैं कब को ? आकर फिर से छा भी जाओ ?
गुड़िया भी अब घुमा करती बिन कोई अनिष्ट अंदेशा ? अमन चैन के इस बगिया में मूर्छित कोई पुष्प ना पाओ ?
प्रिय विकास तुम लौट भी आओ
महंगाई का कोई बात ना होगा बेरोजगारी पर व्यंग ना होगा ? निजीकरण और संविदा पर तनिको सा संवाद ना होगा ?
अब ना तुमसे पूछेंगे कुछ निष्कासन का दर्द कठिन हैं ? आकर अपने दर्द बिसारो किसानों को भूल ही जाओ ?
प्रिय विकास तुम लौट भी आओ
विगत वर्ष ही आना था तुम्हें तुमसे पहले कोविड आ गई ? गंगा कब की साफ हो गई यमुना भी इतराती छा गई ?
कंगना भी अब आ गई मुंबई रिया को जरा और नचाओ ? उलझे हैं सब चाइना में अभी जीडीपी को रिवर्स घुमाओ ?
प्रिय विकास तुम लौट भी आओ
©#कुमार
