सफलता बहुत कुछ माँगती है
दिन-रात अलग-अलग हैं, ये वो नहीं मानती है। रात की चाँदनी, दिन की रोशनी कब बनी, ये तक नहीं जानती है। निराश न हो ऐ मुसाफिर, सफलता बहुत कुछ मांगती है॥
बादलों की घनघोर घटायें, न जाने कब शीतलहर बन जाती है। शीतल जल से धुली आँखों की निंदिया, गायब सी हो जाती हैं॥ निराश न हो ऐ मुसाफिर, सफलता बहुत कुछ माँगती है॥
घर से निकलते ही सारी इच्छायें, जैसे अश्कों में बह जाती हैं। बचपन की कश्तियां हमसें दूर किसी पत्तन को अपना बनाती हैं। निराश न हो ऐ मुसाफिर, सफलता बहुत कुछ माँगती है॥ Alive words of Akarshit.
©#आकर्षित मौर्य
