भूलना सीखें ,पर इतना नहीं
कभी-कभी हम समाचार-पत्रों,पत्रिकाओं,टेलिविजन,आदि में वृन्दावन के विधवाश्रम और वृद्धाश्रम की स्तिथि एवं उनके लाईफ़स्टाईल के बारे में पढ़ते रहते है।अभी हाल ही में भारत के प्रधानमंत्री जी ने वृन्दावन के इन आश्रमों का भ्रमण किया और वहाँ के आश्रमवासियों से मिले।\
कुछ महीने पहले 'मुक्तिधाम' नाम से एक हिंदी फिल्म आयी थी;जिसमें एक बूढ़ा पिता अपने बेटे से काशी पहुँचाने की इच्छा जाहिर करता है।उसकी मर्जी के मुताबिक बेटा उन्हें काशी पहुँचाता है,साथ में रहता है।
इसी विषय पर एक और हिंदी फ़िल्म आयी थी-'वॉटर';जिसमें एक विधवा बच्ची,एक विधवा वयस्क एवं अन्य विधवाओं की लाईफ़ को दिखाया गया है।
ये फिल्में जो बनी है,इसमें से जो भी दिखाया गया है वह कितना सही है और कितना गलत है यह विश्लेषण का विषय है और मैं उसपर आपको नहीं ले जाना चाहता हूं।मैं सिर्फ आपको हल्के फुल्के अंदाज में यह बताना चाहता हूं कि ये विधवाएँ वृंदावन आश्रम कैसे पहुंचती हैं और क्यों पहुँचती है।
पहला कारण,इनके बेटे जब इन्हें अपने ऊपर बोझ समझने लगते,बहुओं की प्रताड़नाओं से ये परेशान हो जाते हैं,जीवनसाथी की मृत्यु हो जाती है,तो ये आश्रम की ओर रुख कर लेते।
दूसरा कारण, इनके बेटे नहीं होते,केवल बेटियाँ ही होती है।आत्मसम्मान की रक्षा के लिये पराया धन समझी जाने वाली बेटीयों के घर जाना ये पसंद नही करते,बल्कि आश्रम चले जाते है।
तीसरा कारण,इनके बच्चे ही नहीं होते।किसी सगे-संबंधियों को अपने यहाँ नहीं रख पाने में असक्षम लोग आश्रम चले जाते।
चौथा कारण,इनकी स्वेच्छा होती है कि ये अपना अंतिम क्षण वृंदावन में भगवान की भक्ति में बिताये, जैसा 'मुक्तिधाम' फ़िल्म में है।
पाँचवा कारण,सामाजिक परिपाटी बनी हुई है,कि अमुक घटना घट जाने पर विधवा को विधवाश्रम ही जाना है;जैसा कि 'वॉटर' फ़िल्म में दिखाया गया है।पहले के सती प्रथा का स्थान अब आश्रम प्रथा ने ले लिया है।
छठा कारण,जीवनसाथी ने किसी कारणवश साथ छोड़ दिया।आत्महत्या करने के बजाय इन्होंने आश्रम जाना सही समझा।
सातवां कारण, इनके संबंधी दर्शन कराने के बहाने इन्हें यहां लेकर आये और चुपके से छोड़कर चले गये।वे दुबारा इनसे न तो मिलने आये ना इनकी खबर ली।
इसके अलावे भी कई कारण गिनाये जा सकते है जिसकी वजह से ये विधवाएँ या बुढ़े इन आश्रमों तक पहुँचते हैं;गौर करने वाली बात यह है कि इनमें से अधिकांश मजबूरी में ही यहाँ रहते है।
अधिकांश का जी यही करता कि वे अपने अंतिम क्षणों को अपने लोगों के साथ,अपने परिवेश में बिताये।जिनके लिये उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया वे उसकी देखभाल करे,प्यार करे।
लेकिन हम इतने खुदगर्ज हो गए है कि अपने सोफे की तरह पुराना होने पर उन्हें या तो अपने दरवाजे पर कुत्तों की तरह रखवाली के लिए सुलाते है या आश्रम पहुँचा देते।
हमें परिवार प्रबन्धन सीखना चाहिये और इसकी शुरुआत अपने घर से करनी चाहिये।हम अपने कैरियर में अपने बॉस को खुश कर लेते है,अपने लाइफ में अपने पार्टनर को खुश कर लेते है उनके लिए शीशमहल बना देते है।जिन्होंने हमें इस दुनियाँ में लाया;उन्हें जब हमारी सबसे ज्यादा जरूरत होती है,उस वक्त उन्हें और उनके योगदान को क्यों भूल जाते है?;उन्हें आश्रमों में क्यों छोड़ आते? इसपर हमें विचार करना चाहिए।
