Satish Kumar Pandey
Satish Kumar PandeyCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·2 min read·

नई चेतना ,नई जागृति

"त्यौहार" आमलोगों के जीवन में बोरियत को थोड़ा कम करने के मामले में एक शानदार नवाचार है जोकि हमारे पूर्वजों के द्वारा किया गया है.....पर इस नवाचार को समय-समय पर फर्जी विश्वासों से मुक्त करना हमारा दायित्व है !!!

आज पुरे मिथिला में चौरचन लोकपर्व पुरे हर्षोल्लाष के साथ मनाया जाता है...!

16वीं शताब्दी से ही मिथिला में ये लोकपर्व मनाया जाता है ! इस लोकपर्व की शुरुआत मिथिला नरेश महाराजा हेमांगद ठाकुर की महारानी हेमलता के द्वारा की गयी थी, जो बाद में मिथिला का लोकपर्व बन गया !!

इस पर्व के पीछे की कहानी ये है कि सन् 1568 ई. के आस-पास मिथिला नरेश हेमांगद ठाकुर को लगान वसूली की अनियमितता के कारण दिल्ली के बादशाह अकबर ने दिल्ली बुलाकर उन्हें लगान छुपाने के आरोप में कारावास में डाल दिया ! मिथिला नरेश को ग्रहों की गणना में काफी रूचि थी ! कारावास में भी वो वही करते थे, और उन्होंने चंद्र ग्रहण की भविष्यवाणी की पर अकबर को उनकी भविष्यवाणी पर विश्वास नहीं था , तब अकबर ने कहा अगर आपकी भविष्यवाणी सही हो गयी तो आपका सजा माफ़ हो जाएगा..! फिर उनके द्वारा कि गयी गणना के अनुसार ही ग्रहण का माह, तारीख और समय सब सही निकला !! फिर बादशाह ने उनका सजा माफ़ कर राजा को वापस भेज दिया ! इसी ख़ुशी में मिथिला की महरानी और प्रजा ने अपने राजा की वापसी की ख़ुशी में ये चतुर्थ चंद्र की पूजा की !!

छठ पर्व की तरह ही हर तबके हर वर्ग के लोग इस पर्व को हर्षोल्लाष पूर्वक मनाते है ! छठ में जहाँ हम लोग सूर्य को साधुवाद अर्पित करते है, वहीं इस चौरचन पर्व में हमलोग चन्द्रमा को साधुवाद अर्पित करते है !!

दोनों ही पर्व के साथ बहुत सारी फर्जी मान्यता भी जुड़ी है.....पर जरुरी नहीं है कि त्यौहार मनाते हुए हर फर्जी मान्यताओं को सही माना जाए.....!! हर फर्जी मान्यताओं को त्यौहार से अलग करकर कुछ सहज बदलाव करना जरुरी होता है ताकि ये त्यौहार आधुनिक समय और समझ से विरोधाभास के बजाय तारतम्यता स्थापित कर सके..!!

इस पर्व में बहुत सारे पकवान बनते है प्रसाद के लिए....खाजा ,लड्डू , टिकरी , बालूशाही ,खजूर , पीरिकिया , दालपूरी ,खीर.....आदि पकवान...इसके अलावा कम से कम पाँच प्रकार का फल और आठ - दस मटकुरी( मिट्टी का दही रखने वाला बर्तन ) दही.....!! इन सभी प्रसादो को चन्द्रमा दिखने से पहले सजा कर शाम में आँगन में रखा जाता है....फिर चन्द्रमा के दर्शन के बाद सभी टूट पड़ते है अपनी पेट पूजा के लिए....आँगन में ही केले के पत्ते पर यह प्रसाद खाया जाता है....!!

फिर पूरे गावँ में इसका प्रसाद बांटा जाता है जोकि इस पर्व को एक सामाजिक आयाम देने में बहुत अहम भूमिका निभाती है....!!

नोट :- इस लेख में आप इस पर्व से जुडी कुछ बातें नहीं पढ़ पाए....जैसे कि इस पर्व में महिलायें उपवास करती है......तो इस दिन खाली हाथ चन्द्रमा का दर्शन करने से उसके घर चोरी हो सकता है...या उस पर कलंक लग सकता है....आदि आदि...!! ऐसी फर्जी मान्यताओं पर मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं विश्वास करता इसलिए मैंने इसका उल्लेख नहीं किया.....और मेरा "सहज बदलाव" का आशय इन्हीं सब बातो से था...!!