एक अटल व्यक्तित्व
हार नहीं मानूँगा, रार नहीं ठानूँगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी कविता को चरितार्थ किया और जब-जब मौका मिला इन्होंने देश के लिए एक नया गीत गाया है। चाहे वह पोखरण में परमाणु परिक्षण का हो या फिर स्वर्णिम चतुर्भूज परियोजना का हो या फिर कारगिल युद्ध का। अटल जी ने अपने अटल निश्चय से यह साबित कर दिया कि उनमें कुछ नया करने की इच्छा शक्ति है।
देश का एक ऐसा प्रधानमंत्री जो अपने पूरे राजनीतिक कार्यकाल में उग्रराष्ट्रवाद के समर्थक पार्टी के साथ रहे और उदारवाद की नीति के साथ उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन पूरा किया। इनकी उदारवादी नीति के कारण ही जब वे संसद भवन में सत्ता पक्ष में रहे या विपक्ष में रहे किसी ने इनके ऊपर किसी तरह का आरोप नहीं लगाया और संसद भवन में जब जिस तरह का भाषण दिया सदस्यों ने बड़े प्यार और सम्मान के साथ सुना।
सन 1996 संसद भवन में अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण कौन भूल सकता है जोड़ तोड़ से भाजपा की सरकार बनी इस सरकार के बने 13 दिन हुए थे और इन्हें शक्ति परीक्षण के लिए संसद भवन में अपने आप को साबित करना था। प्रधानमंत्री यह भांप चुके थे कि उनकी सरकार बनने वाली नहीं है उन्होंने संसद भवन में एक भावनात्मक भाषण दिया, भाषण भले संसद भवन से दिया जा रहा था पर यह पूरे भारत को संबोधित किया जा रहा था। पहला मौका था जब संसद भवन से किसी कार्यवाई का लाइव प्रसारण हो रहा था और पूरा देश इस भाषण को सुन रहा था। इस भाषण का असर अगले चुनाव पर पड़ा और भाजपा को पहले से ज्यादा सीटें मिली।
अब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा पीछे मुड़ कर देखने के मुड में नहीं थी कभी भाजपा के पास दो सीट थी अब स्थिति यह थी कि 100 से ऊपर थे। सन 1998 में इसके पास 182 सीट थी। इसी साल चुनाव हुआ जिसमें राजग फिर से 13 पार्टियों के साथ मिलकर सरकार बनाने में सफल रही और यह मात्र 13 महीने में फिर से गिर गई। इस बार अटल जी के सहयोगी जयललिता और मायावती नें साथ नहीं दिया और सरकार एक वोट से गिर गई।
इसके पीछे एक कहानी यह भी है कि जिस साल अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री का पद संभाल रहे थे उसी साल देश के सबसे पुराने राजनीतिक पार्टी में एक महिला नए अध्यक्ष के रुप में शपथ ले रही थी। कांग्रेस ने अपने नये अध्यक्ष सोनिया गांधी के रूप में चुनी और इनके मार्गदर्शन में आगे की रणनीति पर काम करने लगी।
कहा यह जाता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी और सबसे मजबूत पार्टी होने के नाते वह अपना दमखम दिखाना चाहती थी और इसी सिलसिले में सोनिया ने सुब्रमण्यम स्वामी को कहा कि जयललिता और मायावती के साथ एक चाय पार्टी रखी जाए। चाय पार्टी का कार्यक्रम खत्म हुआ और जयललिता नें राजग सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की बात कह दी राजग की सरकार फिर से गिरने की स्थिति में आ गई तमाम कोशिशों के वाबजूद एक वोट से राजग की सरकार गिर गई और एक मजबूत अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी स्थापित हो गई।
हम सभी तो इस घटना को इसी रूप में जानते है कि मायावती के एक वोट के चलते यह सरकार गिर गई जबकि इसकी पूरी परिपाटी सुब्रमण्यम स्वामी ने रचा था आज वे भाजपा के राज्यसभा सांसद है। सरकार गिरने के बाद फिर से चुनाव हुए और इस बार राजग अंक जुटाने में कामयाब हो गई और 1998 में फिर से अटल बिहारी बाजपेयी देश के प्रधानमंत्री बने।
पंडित जवाहर लाल नेहरू के बाद वह पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो लगातार दो बार प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री बनते ही इन्होंने सबसे पहला काम परमाणु परिक्षण का किया। पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देते हुए भारतीय सेना ने कारगिल पर अपना तिरंगा लहराया और देश का मान बढाया।
अटल के प्रधानमंत्री कार्य काल में राजग सरकार की उपलब्धियों में से एक 5846 कि.मी. का स्वर्णिम चतुर्भुज (जीक्यू) राजमार्ग है। इसे दुनिया के सबसे लंबे राजमार्गों में नामित किया गया है।
अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते हुए सन 2002 में गुजरात दंगा हुआ जिसमें हजारों लोग मारे गए अटल बिहारी वाजपेयी कि इच्छा थी कि उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्रमोदी को मुख्यमंत्री पद से हट जाना चाहिए था। पर संघ और साथी सांसदो के दवाब में आकर उन्हें मुख्यमंत्री पद से नहीं हटा सके।
अरुण शौरी अपने एक इंटरव्यु में कहते है कि भाजपा की राष्ट्रीय कैविनेट की बैठक गोवा में होनी थी इसमें यह फैसला होना था कि गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री रहना है या नहीं। शौरी कहते है कि गोवा जाने वाली विमान में अटल और आडवाणी के बीच यह बात होने लगी कि कल नरेंद्र मोदी को क्या करना है दरअसल मोदी को मुख्यमंत्री बनाए रखने कि इच्छा आडवाणी को थी परंतु अटल चाहते थे कि वो इस्तिफा दे दें। आडवाणी ने अटल को कहा कि कल शाम तक आप अपने विचार हमें बता दिजिएगा।
जैसे ही अधिवेशन शुरू हुआ और भाषण का दौर चलने लगा मोदी आए भाषण देने के लिए उन्होंने गुजरात दंगो का जिक्र किया और अपने आप को मुख्यमंत्री पद से हट जाने कि बात कही । अधिवेशन में आए लोगों ने इसका विरोध किया और मोदी फिर मुख्यमंत्री बने रहे।
अटल यह सब देख कर चकित थे कि यह क्या हो रहा है उन्हें समझते देर नहीं लगी और वो समझ गए कि क्या हो रहा है। अधिवेशन के कुछ दिनों के बाद भारत के तीन राज्यों में चुनाव होने थे राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों में बीजेपी की सरकार बनी और भाजपा का कमल अब भारत के अधिकांश राज्यों में अपना आकार बढ़ाने लगा था।
तीन राज्यों में जीत के बाद बीजेपी पूरी तरह से आस्वस्त थी कि हम फिर से चुनाव जीत कर सत्ता में आ रहे है। उस समय के मीडिया ओपिनियन पोल देखे तो आप पाएंगे कि कमोवेश सभी मीडिया घरानों ने भाजपा को जीत ही दिखाया था। पर वस्तुस्थिति उससे उलट हुई और भाजपा को मुंह की खानी पड़ी। कांग्रेस वामदल के साथ मिल कर सत्ता में आ गई।
चुनाव हारने के वाद अटल बिहारी वाजपेयी शिलमा चले गए वहां उन्होंने बच्चों से बात करते हुए और कई सभाओं में गुजरात दंगों का जिक्र किया और कहा कि हम गुजरात दंगे के चलते हार गए है।
2005 के वाद इन्होंने अपने आप को सक्रिय राजनीति से दूर कर लिया । बहुत कम ही ऐसा मौका आता जब वे चुनावी सभाओं में भाषण देते नजर आते थे।
अटल बिहारी वाजपेयी ने सन 2007 में नागपुर के एक आरएसएस प्रोग्राम में भाग लिया था । वहां उपस्थित बीबीसी मराठी संवादाता कहते है कि "भारी भीड़ जुटी थी। व्हील चेयर से चलने वाले वाजपेयी को मंच पर लाने की ख़ास लिफ़्ट की व्यवस्था की गई थी। जब वे मंच पर पहुंचे तो लोग जबर्दस्त रूप से उत्साहित हो गए। मैंने देखा कि कई लोग अपने पैरों से चप्पल उतार कर उन्हें प्रणाम कर रहे थे, ठीक वैसे ही जैसे वो देवी-देवताओं को करते हैं।" स्त्रोत- https://www.bbc.com/hindi/india-44473985?ocid=socialflow_facebook "
2009 में उन्होंने एक सांसद के रूप में अपना अंतिम कार्यकाल पूरा किया और फिर कभी चुनाव नहीं लड़े। लंबे समय से उनके दोस्त रहे एन.एम.घाटे कहते हैं- "2009 में वाजपेयी को स्ट्रोक पड़ा था, जिसके बाद से वो ठीक से बात नहीं कर सकते।" स्त्रोत- https://www.bbc.com/hindi/india-44473985?ocid=socialflow_facebook
अटल बिहारी वाजपेयी गिरती सेहत के चलते 2009 का लोक सभा चुनाव नहीं लड़े और ज्यादातर समय वे अपने घऱ में बिताने लगे। अटली जी के स्वास्थ की जांच देश के सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल संस्थान एम्स की देखरेख में चलने लगी।
जन्म, शिक्षा एवं राजनीति
देश के उदारवादी राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी जी जन्म ग्वालियर में हुआ था। अटल बिहारी वाजपेयी जी के पिता पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी थे। इनका मूल जन्म स्थान उत्तर प्रदेश में आगरा जनपद के प्राचीन स्थान बटेश्वर में था। पण्डित कृष्ण बिहारी वाजपेयी मध्य प्रदेश की ग्वालियर रियासत में अध्यापक थे। वहीं शिन्दे की छावनी में 25 दिसम्बर 1924 को कृष्णा वाजपेयी की कोख से अटल जी का जन्म हुआ था।
छात्र जीवन से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक बने और तभी से राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेते रहे। कानपुर के डी०ए०वी० कालेज से राजनीति शास्त्र में एम०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उसके बाद उन्होंने अपने पिताजी के साथ-साथ कानपुर में ही एल०एल०बी० की पढ़ाई भी प्रारम्भ की लेकिन उसे बीच में ही विराम देकर पूरी निष्ठा से संघ के कार्य में जुट गये। डॉ॰ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति के क्षेत्र में आगे बढ़ने लगे।
पूर्व प्रधानमंत्री को उनके राजनीतिक कार्य कुशलता, व्यक्तिगत जीवन के लिए पद्म विभूषण, श्रेष्ठ सांसद तथा देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया।
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