कोई माँ कभी न वृद्धाश्रम पधारे
झुकी कमर कभी घर ना बुहारे, हो ना जायें माँ-बाप कभी बेसहारे।
इसलिये हार गयी अपना सबकुछ, कि उसका लाल कभी कुछ न हारे।
माँगती है हर रोज दुआ प्रार्थना में, जिन्दगी में तकदीर ठोकर न मारे।
ऐसे चाक पर बनाया किरदार को, हर कोई उसपर अपना जीवन वारे।
प्यार से देखती है सुन्दर मुखड़े को, जैसे कोई नज़र न किसी को निहारे।
मिले हर माँ को जग में उसका रुतबा, कोई माँ कभी न वृद्धाश्रम पधारे।
