बेच रहा हैं देश
देश तो हमेशा अपनों ने ही लूटा, किसी ग़ैरों में कहाँ दम था ?
बेईमानों के हमेशा से वारे-न्यारे ? ईमानदारों के घर सदा ही कम था।
पहरेदारों ने की सदा पहरेदारी ऐसी ? कि भरोसे को भी भरोसे पे ग़म था।
झोपड़ियां दो रोटी को रहे पशोपेश ! महलों के हाथों रौंदा गया कमोबेश ?
ग़रीबों के हाथ सदा दुआओं के उठे ! और वो बड़े सफ़ाई से बेच रहा हैं देश ?
©#कुमार
