Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

बेच रहा हैं देश

देश तो हमेशा अपनों ने ही लूटा, किसी ग़ैरों में कहाँ दम था ?

बेईमानों के हमेशा से वारे-न्यारे ? ईमानदारों के घर सदा ही कम था।

पहरेदारों ने की सदा पहरेदारी ऐसी ? कि भरोसे को भी भरोसे पे ग़म था।

झोपड़ियां दो रोटी को रहे पशोपेश ! महलों के हाथों रौंदा गया कमोबेश ?

ग़रीबों के हाथ सदा दुआओं के उठे ! और वो बड़े सफ़ाई से बेच रहा हैं देश ?

©#कुमार