खफ़ा है वक़्त हमसे
नहीं क्यों आज कल सर में नया कुछ शोर मचता है, नहीं क्यों आज कल दिल में कोई अहसास नचता है ।
लगे क्यों आज कल हर चीज बोसीदा है बासी है, लगे क्यों आज कल हर शख्श ज्यों ओढ़े उदासी है।
पहनता-ओढ़ता हूँ आज-कल मैं ऊब सोता हूँ , सड़े लम्हात बोझिल ऊब से बेगार ढोता हूँ ।
नहीं दिन बीतता लम्बा,न लम्बी रात ही बीते, थका मजबूर हूँ मैं ये उधारी जिंदगी जीते।
खफ़ा है वक़्त हमसे भाग्य का फट-हाल जेबी है, हमारी जिंदगी के बाग़ का मौसम फरेबी है।
बयाँ नैराश्य करने को नया साँचा चुराना है, फक़त बोतल नया बाकी वही दारू पुराना है।
जरा दो तीन पिछले नज्म मुट्ठी में भरो भींचो निराशा चू पड़ेगी ,बू-उबाऊ साँस गर खींचो।