Kumar Bhupesh
Kumar BhupeshCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

इक पुड़िया हैं सब पर भारी ?

बाढ़, कोरोना महामारी भ्रष्टाचार या कालाबाजारी महंगाई और कहाँ बेरोजगारी राजनीति क्या नौकरशाही भला कहाँ ये सब लाचारी इक पुड़िया हैं सब पर भारी ?

कृषक, मज़दूरों का क्या उद्दमियों की बात निराली ग़रीबी के सिलबट्टे पर अमीरी की चौसरबाजी कौतुक के असबाब सारी इक पुड़िया हैं सब पर भारी ?

पूर्वज का ठहराव बेच कैसे नित मुस्काते हो दामन के दागों को दबाकर निर्लज्जता का दौर हैं जारी उम्मीदों से उम्मीद हैं हारी इक पुड़िया हैं सब पर भारी ?

महिलाओं के शोषण पर जज़्बातों ने चोंच मिला ली चार सौ बीसी के खातिर उग आते नित नए मवाली बस उम्मीदों की करो सवारी इक पुड़िया हैं सब पर भारी ?

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