मैं दीया हूँ
मैं दीया हूँ,तम को मिटाता हूँ। भटके राही को राह दिखाता हूँ। जो तिमिरांचल में डूब रहे ,उनके अन्तर्मन में एक समा जलाता हूँ। मैं सर्वस्व समर्पण करके भी इस जहां में सदा खिलखिलाता हूँ।
हर स्वर्णिम दास्तान की मैं साक्षी बन जाता हूँ। मिटा के वजूद स्वयं का सबको रोशनी मयस्सर कराता हूँ। जब भी हताशा का साया हो ,एक उम्मीद की लव जलाता हूँ। हवा के झोके, मुझे रोके, उसमें साहस कहाँ? तूफानों में भी अडिग हो जाता हूँ। मैं दीया हूँ सबको त्याग का संदेश दे जाता हूँ। दीपोत्सव की आप सबको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
©सतीश कुमार पाण्डेय
