दुर्गा
आज दुर्गे को पिंजरे में बंद, कैसा विकास है यह। / करोना के आगे, तिल्लाजली पड़ गई, बुड़ाई पर जीत की। / प्रकृति कहती लौट हमारी आेर, हम दौड़ लगाते उलट।
रास्ते दो है चुनने के, एक प्राकृतिक को अपनाओ मूल रूप में। / दूसरा प्राकृतिक की माया को अपनाओ, इसके रूप भिन्न है। / प्रकृति के है प्रकार, अपनाए कैसे निर्भर करती एकांकी पर।
प्रकृति की गोद है, सरल उपाय लिए सभी दुखो के। / माया है चकाचौंध की प्रतीति, नित नए है इसके रूप। / वैक्सीन वैक्सीन कर रहे है, नए दुनिया की अवतार।
करोना का उपाय समेटे, प्राकृतिक चिकित्सा। / प्राकृतिक की गोद, फूल पुष्पित, आनंदित है। / चुनो प्राकृतिक को, रास्ते बस एक ही है।
क्यो ना चुने, इसके मूल रूप को, ना की इसकी माया। / प्राकृतिक सभी की मूल, विष्णु की योग निंद्रा है। / सभी की निमित, नियामक भी, दुर्गा क्या कैद हो सकतीं?
#दुर्गा
