प्रकृति
बादल मंडरा रहे, घूमर रहे धीरे धीरे। गिलहरियां लगा रही चौकरि चढ़ी जा रही पेड़ पर। तितलियां, पक्षियों अनेक, मंडरा रही पास पास। सभी अपने पूरे जोश से, लग गए है, जीविकापार्जन में।
कोयल की कूक कुक, हवाओं के हल्की थपेड़ों ने। सहलाती हमे बार बार, कहती लग जा गले। लिपट जा हमसे, ले खुशुबू इस सोंधी मिट्टी की। कर ले आत्मसात, इस वातावरण की सभी खूबियों को।
प्रकृति के जीव जंतु, पेड़ पौधे सभी अपने गुमान पर है। सभी बस कहती, सुन मेरी अवाजो को, निहार मुझे। बिल्कुल शांत सभी पेड़, खड़ी नंदी सी। बस इंतजार में, अनंत से अनंत की।
चिड़ियों की चहचहाहट, जगाने वाली। कर रही मन को झंकृत, उन खूबियों प्रकृति के प्रति। मजे खड़े आत्मसात करता हुए, इस प्रकृति के रंग को सुबह की बेला, बिल्कुल आत्मसात करने योग्य।
मन है करता, झुमु इनके तादात्म्य में। घुल जाऊ, रंग जाऊ इनके रंग में। आत्मसात करूं इस प्राकृति को। ये जीवनवर्धनी, ऊर्जा देने वाली है।
करे दर्शन, सूर्य की आभा का। प्रकृति के विशालता का, इसके दयालुता का। ले प्रण, करे सुरक्षा इस पर्यावरण को। जीव विविधता रहे, बरकरार।
पेड़ पौधे लगाएं, अपने चारो ओर। बादल मंडरा रहे, घूमर रहे धीरे धीरे। गिलहरियां लगा रही चोकरी, चढ़ी जा रही पेड़ पर। बनी रहे ऐसे है, प्रकृति की आभा चहुंओर हो।
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©#मिथिलेश कुमार
