हमारी मीडिया
निरर्थक बात चौबीस गुना सात बस चीख़-पुकार लुप्त वो धार पत्रकार करें व्यापार पत्रकारिता बना बाज़ार सुने हम कब तक ऐसे ?
बेतुकी बकवास नहीं रही अन्याय के खिलाफ बेजुबानों की आवाज़ समाचार नहीं सिर्फ़ प्रचार बिके अशआर छपे संवाद व्यर्थ विन्यास उन बातों पर भरोसा भला हम करें तो कैसे ?
करनी थी क्या बात और क्या कर रहे हैं किसानों की जगह ड्रग्स ले उछल रहे हैं ? ये सब चुनावी शिगूफे हैं इसे तुम खूब उछालो पर, थाली वाले किसानों की थोड़ी तो दुआ लो ? दे निवाले इन्हें हम कब तक ऐसे ?
©#कुमार
