ग्रहण
प्रेम पर हावी होते हिंसा और धर्म की जय-जयकार के शोर में धुंधले होते मानवीयता और संवेदनहीनता के इस दौर में "ग्रहण"जैसी सीरीज एक उम्मीद बनकर उभरती है। उम्मीद जो संबल देती है कि इस दुनिया को प्रेम से ही जीता जा सकता है। दंगे या किसी भी तरह की हिंसा से नहीं।
हॉटस्टार पर रिलीज वेब सीरीज "ग्रहण" नयी वाली हिंदी के चर्चित लेखक सत्य व्यास की किताब 'चौरासी' से प्रेरित है। जिसकी कहानी 1984 के सिख दंगों की बुनियाद पर रची गई है। ये दंगा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वो काला अध्याय है जिसकी वजह से एक धर्म विशेष के सैकड़ों लोग नफरत और हिंसा की आग में झुलसकर ख़ाक हो गए। इस दंगे ने न सिर्फ गंगा-जमुनी तहज़ीब को बल्कि मानवीयता को भी तार-तार कर दिया था। इन दंगों के पीछे कौन था और किसके कहने पर उन मासूम लोगों को गाजर-मूली की तरह काटा गया। असलियत में ये सच समय की परतों में कहीं छुप गया। पर "ग्रहण" सीरीज इसकी पड़ताल करती हुई घटना की तह तक पहुंचती है।
सीरीज की शुरुआत इतनी कसावट के साथ होती है कि दर्शकों की उत्सुकता पहले सीन से ही बढ़ जाती हैं कि आगे क्या होने वाला है? कहानी बोकारो में हुए 1984 के सिख दंगों की पृष्ठभूमि में मनु और ऋषि के प्यार के सहारे न सिर्फ आगे बढ़ती है बल्कि सीरीज की आत्मा इन्हीं की प्रेम कहानी में छुपी होती है। सिरीज में बदलते समय की राजनीति, सस्पैंस और थ्रिल को बखूबी दिखाया गया हैं।
जब भी किसी किताब का फिल्मांकन होता है तो ये देखना बड़ा दिलचस्प होता है कि पन्नों से निकली कहानी में कितने नाटकीयता भरे बदलाव किए गए हैं। 'चौरासी' पन्नों से निकलकर जिस रचनात्मकता के साथ "ग्रहण" के रूप में पर्दे पर दिखायी देती है वो कहानी के मर्म को बचाते हुए बदले हुए माध्यम के हिसाब से सही प्रतीत होती है। शायद यही वो वजह जिसके कारण "ग्रहण" को 'चौरासी' से प्रेरित कहा गया है ना कि आधारित।
इस वेब सीरीज को न सिर्फ मनु और ऋषि के बीच का अपनत्व, प्रेम और समर्पण खास बनाता हैं बल्कि इस सीरीज के एक से एक बेहतरीन डायलॉग्स जैसे "हमला करने वाला बस दंगाई होता है, हिन्दु या मुस्लिम नहीं।", "राजनीति में कुछ बदलता नहीं है, टलता है और माहौल देखकर इतिहास अपने आप को दोहराता है।", "राजनीति किसी के तरीके से नहीं चलती, उसकी अपनी चाल होती है।", "हम अक्सर दुनिया में चीजों को काले और सफेद में देखते हैं, पर सच उसके बीच का रंग होता है।", "यहां की खबरें वहाँ के अखबारों में आती है और वहाँ की खबरें यहाँ के सारे अखबारों में। क्योंकि हम सच जानना ही नहीं चाहते। हम जहां रहते हैं वहां की बात क्यों नहीं करते, क्योंकि हम दूसरों के घाव दिखा के अपने घाव छुपाना चाहते हैं।", "ग्रहण अंधेरे के साथ रौशनी भी लेकर आता है।" जैसे तमाम एक से एक शानदार डायलॉग इस सीरीज की प्रभावशीलता को बढ़ाते हैं।
कलाकारों की बात करें तो अमृता सिंह के किरदार में जोया हुसैन प्रभावी दिखती हैं। ऋषि रंजन बने अंशुमन पुष्कर अपनी बेहतरीन अदायगी के दम पर दर्शकों के बीच खुद को स्थापित कर पा रहे हैं। इनके अलावा पवन मल्होत्रा, वमिका गब्बी, सहीदुर रहमान, टीकम जोशी जैसे कलाकारों से सजी ये वेब सीरीज रोमांच से भरी है।
उम्मीद है इस सीरीज की सफलता के बाद वेब सीरीज के निर्माता और निर्देशकों को भारतीय भाषाओं की प्रसिद्ध कहानियों के फिल्मांकन की झिझक कुछ हद तक मिट जाएगी। "ग्रहण"अपने समय एक उम्दा और बेहतरीन सीरीज है। जिसे आप सबको पहली फुर्सत में जरूर देखनी चाहिए।
पर्सनली बताऊं तो इस सीरीज का इंतज़ार मुझे तबसे था जबसे शैलेश भारतवासी सर ने इस किताब पर वेब सीरीज बनने की घोषणा की थी। मुझे हिंदी नॉवेल्स पढ़ने का चस्का साल 2017 में तब लगा। जब हिंदी युग्म प्रकाशन से प्रकाशित दिव्य प्रकाश दुबे की नॉवेल "मुसाफिर कैफ़े" मैनें पढ़ी। फिर तो उसके बाद इस प्रकाशन से छपने वाली एक के बाद एक सारी किताबें मैनें पढ़ डाली। सत्य व्यास, मानव कौल, अंकिता जैन निखिल सचान और नीलोत्पल मृणाल जैसे नए लेखकों की एक फौज से हम युवाओं का परिचय इसी प्रकाशन नें करवाया। अब ये विमर्श का विषय है की उनका लेखन सहित्य के पैरामीटर को पूरा करता है या नहीं। पर वो जो लिख रहे थे उसकी ज़बान युवा है। जिसे हम या आप "नई वाली हिंदी" के नाम से भी जानते हैं। हिंदी का पाठक होने की वजह से हिंदी की किसी चर्चित नॉवेल पर किसी सीरीज या फ़िल्म का निर्माण होना इस बात की उम्मीद देता है कि भविष्य हिंदी का है। साथ ही साथ ये तसल्ली भी की हिंदी का बढ़ता बाज़ार आने वाले समय में हिंदी में लेखन को एक नया मुक़ाम देगा।
सीरीज: ग्रहण निर्देशक: रंजन चंदेल प्लेटफार्म: डिज्नी प्लस हॉटस्टारप
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©Mausam Jaiswal
