Rahul Devashish
Rahul DevashishCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·2 min read·1·

दो दुनियाँ का सच

यह पृथ्वी सात महाद्वीपों&nbsp;में बँटी हुई है - एशिया, यूरोप, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, आर्कटिका&nbsp;&nbsp;और&nbsp;अंटार्कटिका। इन महाद्वीपों के बीच सागर एवं&nbsp;महासागर है जो इन्हें एक दूसरे से अलग करते है। <!--more--जैसे- हिन्द महासागर, प्रशांत महासागर, अटलांटिक महासागर, आर्कटिक सागर, अंटार्कटिक सागर, लाल सागर,इत्यादि। दो ध्रुव है- उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव। इन महाद्वीपों और महासागरों के ऊपर वायुमंडल है जिनमें विभिन्न गैस पाये जाते है।

वायुमंडल के ऊपर शुन्य है जिसे अंतरिक्ष कहा जाता है। यह अंतरिक्ष आकाशगंगा&nbsp; का हिस्सा है। हमारी पृथ्वी दुग्ध मेखला आकाशगंगा का हिस्सा है। ब्रह्माण्ड में असंख्य आकाश गंगायें है जिनकी खोज विभिन्न देशों की अंतरिक्ष एजेंसियां कर रही है।

महाद्वीप स्थल भाग है यानि यह पानी से ऊपर उठा हुआ भाग है । महासागर जल का भंडार है। ऐसा प्रमाण है कि सम्पूर्ण पृथ्वी पहले एक ही द्वीप था जिसे पैंजिया कहा जाता था। भारतीय वैदिक&nbsp;शास्त्रों में इस पैंजिया को&nbsp;भारतवर्ष कहा गया है।

भूगोलवेत्ताओं का दावा है कि यह पृथ्वी बिग बैंग के समय में धधकता हुआ&nbsp;गैस का गोला था। लम्बे समय के बाद यह गोला ठण्डा हुआ, फिर जलमंडल&nbsp;, स्थलमंडल&nbsp; एवं वायुमंडल के रूप में ये अस्तित्व में आये। इसके बाद यहाँ जीव की उत्पत्ति हुई जिसे जीवमंडल कहा जाता है।

भारतीय वैदिक शास्त्रों में इस जलमंडल, स्थलमंडल , वायुमंडल , जीवमंडल, अंतरिक्ष , आकाशगंगा इत्यादि को सम्मिलित रूप से&nbsp;<u<strongभौतिक संसार </strong</uकहा गया है। विश्व की सारी&nbsp;अंतरिक्ष एजेंसियां इस भौतिक संसार के अंग है और भौतिक संसार में रहकर ही भौतिक संसार का अध्ययन कर रहे है। जैसे एक कुएँ का मेढ़क कुएँ के अंदर हो और कुएँ के बारे में पता कर रहा हो वैसी ही स्थिति इन अंतरिक्ष एजेंसियों की है।

जैसे एक&nbsp;कुएँ&nbsp; में पड़ा मेढ़क सिर्फ उस कुएँ की जानकारी रख सकता है, कुएँ के बाहर का नहीं।कुएँ के&nbsp;बाहर की&nbsp;वास्तविक स्थिति&nbsp;का अध्ययन वही कर&nbsp;सकता है जो कुएँ के बाहर हो।&nbsp;वैदिक शास्त्रों में इस भौतिक संसार को भवसागर कहा गया है। इन शास्त्रों में एक ऐसी दुनियाँ का खुलासा किया गया है जो इस भौतिक संसार से अलग है। इसे <u<strongआध्यात्मिक संसार</strong</u&nbsp;&nbsp;कहा गया है।&nbsp;सशत्र तो यहाँ तक कहते है कि यह भौतिक संसार&nbsp;&nbsp;जो है वह आध्यात्मिक संसार की परछाई मात्र है।

जैसे कुएँ के जल में आसमान की परछाई नजर आती है। ठीक उसी प्रकार इस भौतिक संसार में आध्यात्मिक संसार की परछाई नजर आती है। पंचतंत्र में शेर-लोमड़ी और कुएँ की कथा आती है। जिसमें लोमड़ी शेर को यह सुचना देती है कि कुएँ के अंदर एक शेर है। कुएँ के अंदर शेर झांकता है तो कुएँ के अंदर उसे एक शेर दिखाई देता है। हालाँकि&nbsp;कुएँ के अंदर कोई शेर है नहीं लेकिन दीखता है। जो नहीं है उसे <u<strong'माया'</strong</u&nbsp;कहा जाता है। यानि यह भौतिक संसार माया जगत है। वास्तविक संसार तो आध्यात्मिक जगत है।

अपने अगले लेख में हम भौतिक संसार और आध्यात्मिक संसार के बारे में और कुछ बातें जानेंगे।&nbsp;जानते रहिये-'धर्म के पीछे का राज'।