Adarsh Maurya
Adarsh MauryaCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

उसका ख़याल

मैं आइना था वो मेरा ख्याल रखती थी, मैं टूटता था तो चुन कर संभाल रखती थी।

हर एक मसले का हल वो निकाल रखती थी, जहीन थी, मुझे हैरत में डाल रखती थी।

मैं जब भी तर्क-ए-ताल्लुक की बात करता था, वो मुझे रोकती थी कल पे टाल रखती थी।

वो मेरे दर्द को चुनती थी अपने पोरों से, वो मेरे वास्ते खुद को निढ़ाल रखती थी।

वो डूबने नहीं देती थी दुःख के दरिया में, मेरे वजूद की नाव उछाल रखती थी।

दुआएं उसकी बलाओं को रोक लेती थी, वो चार सौ हाथों का ढ़ाल रखती थी।

एक ऐसी धुन कहीं नहीं फिर मैंने सुनी, वो मूनफरेद सी हँसी में कमाल रखती थी।

उसे नदामतें मेरी कहाँ गवारा थी, वो मेरे वास्ते आसान सवाल रखती थी।

वो मुन्तजिर मेरी रहती थी धुप में शायद, मैं लौटता था छांव निकल रखती थी।

बिछड़ के उससे मैं दुनिया की ठोकर में हूँ, वो पास थी तो मुझे लाजवाल रखती थी।

©#आदर्श मौर्य