स्वप्न फिर से बुनो
कह रहा हूँ जरा ध्यान से तुम सुनो ? सोच का इक नया दायरा अब चुनो !
अभी जीवन की उखड़ी सी हैं पटरियां ? इस सफर का कोई स्वप्न फिर से बुनो !
मैं से हम हो गए हम से मैं ना कहो ? प्यार का अब नया पाठ फिर से गहो !
बन सको तो बनो तुम कथानक मेरी ? वक्त ए तामीर में , तुम मेरा नाम लो !
ऐसे उलझन में उलझे रहोगे तो क्या ? वक्त विनिमय का ये, तुम इसे थाम लो !
©#कुमार
