Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

सोन नदी

आगे बढ़ते हुए, मनोरम दृश्य, नदी सोन की। बीहड़ मालूम पड़ती, जब भी उफान पर होती। भारी हायतौबा मचाती, इसकी वीरान चेहरा दृष्टिगत।

आगे बढ़ता, मजबूत पायों वाला, रेल पुल। दूसरी ओर है, सड़क पुल। बीच का बीहड़, भव्य मालूम पड़ता। सुनहरे बालू पर, सफ़ेद चादर ओढ़े। उजले फूल वाली, जंगली घांस फैली चारो ओर।

इस पार से लेकर, उस पार तक। रोक देती, सोचने को मजबूर करती। सोन कटता गया, हमारे स्वार्थ को चढ़ावा बनता गया। बालू माफिया का जलवा ऐसी, कर रही पर्यावरणीय नुकसान।

सोन की विशालता, नजर आ रही है। आगे बढ़ते हुए, मनोरम दृश्य नदी सोन की। अमरकंटक उद्भव वाली, सोन अपना विस्तार से आगे बढ़ रही।

#सोन #दिल

©#मिथिलेश कुमार