मत पूछो जिंदगी का फलसफा
मत पूछो जिंदगी का फलसफा क्या है, पुराने कैलेंडर में अब रखा क्या है।
वही खेत-खलिहान वही घर वही गाँव, औरों की तरह मैंने भी उसे दिया क्या है।
गुम हो गया आकर शहर के आबोहवा में, आनेवालों के लिए इससे अलग नया क्या है,
बहुत मुश्किल हुआ उनसे रस्मे-वफा निभाना, जो ये नहीं जानते मोहब्बत में दगा क्या है।
मेरे बचपन तूं क्यों मुझसे रूठ गया, अब समझने लगा ठंडी-गर्म हवा क्या. है।।
©#रंजीत
