Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

खुशियां मनाती जिंदगी

दुकान ऐसी सज गई, मानो उबर गई। कोरोना की मार से, खुशियां मनाती जिंदगी। सुनसान राहों ने करवट ली, जीवन दौड़ पड़ी है।

ट्रैफिक भी खूब है, रोड पर ट्रकों का रंगदारी भी खूब है। बड़े खुश है गुमटी वाले, लोग आते, खाते पान। समोसे की दुकान, खड़े खड़े घेरे, मजे ले रहे इसके स्वाद। सभी काम पे लग गए, रुकी अर्थव्यवस्था चल पड़ी है।

पर्यावरण जीवंत हो, मुस्करा रही है। कह रही कोरॉना को थैंक्स, छिपा नहीं पा रही खुशी। फिर भी देने को तैयार, सदा कर्तव्यनिष्ठ।

पृथ्वी अंगड़ाई ले रही, कहती औकात में रह मानव। मत ले टक्कर हमसे, बेमौत नस्ट कर दिए जाओगे। संभल, पहचान अपनी सीमा, रह इतने में ही।

करोना विषाणु, विष्णु अवतार धारण कर। रोक लगाई, मानवीय गुंडागरदी पर। समझा गई, एक पुनर्भरण क्रिया प्रकृति की।

प्रकृति कभी रुकती नहीं, सदा गतिशील। हम उस प्रिक्रिया के, एक अंश मात्र ही। मानव का महत्व क्या, समझे मानव अपनी सीमा।

खुल पड़ी है सारी दुकान, खुशी मना रहे लोग। करोना को थैंक्स, जिंदगी को नए दिशा दे गई। नए रंग देखें जीवन के, नए प्रयोग करवा गई।

दुकान ऐसी सज गई, मानो उबर गई। कोरोना की मार से, खुशियां मानती जिंदगी। सुनसान राहों ने करवट ली, जीवन दौर पड़ी है।

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©#मिथिलेश कुमार