Vivek Rudra
Vivek RudraCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·3 min read·

टूटते परिवार और बिखरते समाज को बचाने का उपचार

पिछले दिनों मैं अपने गाँव गया था।गाँव में मैंने दो बड़े परिवर्तन देखे जिसने मुझे यह लेख लिखने को मजबूर किया।हालाँकि इस तरह के घटनाओं को मैं शहर में भी देखता था लेकिन उसे यह सोचकर नजरअंदाज कर देता  था कि शहर में लोग एक दूसरे को अच्छी तरह से जानते नहीं है इसलिए इनमे इतना अपनापन नहीं है।लेकिन जब पुश्तों से साथ रह रहे अपने गाँव के लोगों के व्यवहार में मैंने यह परिवर्तन देखा तो मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि कुछ तो गड़बड़ है।

पहला परिवर्तन मैंने छठ पर्व (बिहार और उत्तरप्रदेश का  बड़ा पर्व) के दिन छठ घाट को सजाने-सँवारने में लोगों की कम हुई दिलचस्पी के रूप में देखा। अनुमान क्या पूर्ण विश्वास था कि हर साल की भाँति इस साल भी छठ घाटों और उन तक जाने वाली रास्तों को अच्छे से सजाया जाएगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसका मुख्य कारण था गांव के लोगो में सहयोग और सामंजस्य की भावना में कमी आना।पहले लोग पर्व-त्योहार में बढ़-चढ़ कर एक दूसरे की मदद करने के लिये आगे आते थे।अब इस मानसिकता में कमी आयी है।

दूसरा परिवर्तन मैंने एकल परिवार की तरफ समाज का बढ़ती प्रवृति के रूप में देखा।अपने गाँव में मुझे पता चला कि कुछ अच्छे परिवार बंटवारे के कगार पर है। इनमे से एक परिवार ऐसा है जो आर्थिक रूप से सम्पन्न है,दो भाई है,दो साल पहले छोटे बेटे की शादी हुई थी और अब परिवार के सदस्यों के बीच अविश्वास की खाई पनप गई है। ऐसी परिस्थिति क्यों आई? क्या हम लोगो ने कभी इस पर विचार किया कि जिस माता-पिता ने हमे अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया उन्ही के सपने को हम इस बंटवारे की आग में स्वाहा कर रहे है?

जब मैंने इन परिवर्तनों के कारणों पर विचार किया तो इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आज पारिवारिक सामंजस्य और सामाजिक सहयोग की भावना को दुरुस्त करने की नितांत आवश्यकता है।अगर ऐसा नहीं हो पाया तो कुछ ही वर्षों में परिवारिक  विखंडन और सामाजिक मूल्यों के पतन की आग इतनी ज्यादा व्यापक हो जाएगी कि हमारा जीना मुश्किल हो जाएगा।

पारिवारिक सामंजस्य  के लिये क्या करें?

अपना परिवार हमारी पहली पाठशाला है।हम यह सोच विकसित करें कि परिवार की प्रतिष्ठा में  हमारी प्रतिष्ठा है, परिवार की उन्नति में हमारी उन्नति है , उसकी समृद्धि में हमारी समृद्धि और उसकी लाभ-हानि हमारी लाभ-हानि है।ऐसी आत्म-भावना पारिवारिकता का विशेष लक्षण है। घर में जब प्रत्येक सदस्य दूसरे के लिए त्याग करने को तत्पर हो ,उसका अपना स्वार्थ दूसरों के स्वार्थ के साथ जुड़ा हो,एक की पीड़ा सबकी पीड़ा और एक की उन्नति सबकी उन्नति बनकर प्रकट हो तो समझना चाहिए कि हम पारिवारिक सामंजस्य बिठाने में सफल हैं।ऐसा परिवार सदा सुखी रहेगा।

सहयोग की भावना का विकास कैसे करें?

सहयोग अर्थात एक-दूसरे की विभिन्न परिस्थितियों में मदद करना। यह भी अपने परिवार से हम सीख सकते है।परिवार एक ऐसी पवित्र और उपयोगी संस्था है जिसमें मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति का आधार सहयोग,सहायता और पारस्परिकता के भाव पर टिका है।सहयोग की भावना ही मनुष्य जाति की उन्नति का मूल कारण रही है।हर छोटा-बड़ा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संगठन सहयोग की भावना पर आधारित है।इसलिए परिवार व्यक्तित्व निर्माण,समाज निर्माण,राष्ट्र निर्माण और विश्व निर्माण की आधारशिला है। इस भावना को मैंने बचपन के अपने संयुक्त परिवार में महसूस किया है और वह बीते पल आज जब आंखों से गुजरता है तो सोचता हूँ क्या हम अपने आने वाली पीढ़ियों में वैसी मस्ती,प्यार,त्याग और सहयोग की भावना विकसित कर पाएंगे?

निष्कर्ष

मूलतः मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।व्यक्ति से परिवार,परिवार से समाज,समाज से राष्ट्र और राष्ट्र से अंतरराष्ट्र बनता है।तकनीक ने पूरे विश्व को 'ग्लोबल ग्राम' बना दिया है।इस  ग्लोबल ग्राम में लोग भारत में बैठकर जापान के अपने मित्र से चैट और वीडियो कॉल करके बात कर लेता है लेकिन अपने परिवार के सदस्यों से बात नहीं करना चाहता,अपने पड़ोस के बीमार बुजुर्ग को एक ग्लास पानी देने का कार्य नहीं करना चाहते।इस मानसिकता में परिवर्तन जरूरी है।

अंत मे, बस इतना ही कहना चाहूंगा कि निकट भविष्य में मैं भी शादी के बंधन से जुड़कर एक नये जीवन की शुरुआत करने वाला हूँ।आशा करता हूँ कि आप सब की दुआओं और ईश्वर के आशीर्वाद से अपने परिवार के सदस्यों के बीच सहयोगी भाव के साथ जीवनयापन कर सकूँ और मेरे गाँव मे फिर से सहयोग और सामंजस्य की भावना विकसित हो सके। क्या आप भी इस समाज निर्माण, राष्ट्र निर्माण और विश्व निर्माण में हमारा साथ देंगे?