Amresh Giri
Amresh GiriCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

बेवफा रात

नींद का भी अजीब खेल है, आ जाये तो रात भर चैन से सोना, और न आये तो रात भर बैचैन रहना।

आज यही आलम हमारा है , लगता है नींद भी हमसे रूठ गयी है, तभी तो हमे रात भर बैचैन कर गयी है।

न जाने क्यों नींद हमसे खफा हो गयीं, लगता है ये रात भी आज बेवफा हो गयी, बहुत देर से बुला रहा हूँ नींद को , कमबख़्त ये नींद भी आज आती नहीं है।

कुछ अपने क्या छूट गये हमसे , आज सपने भी टूट गये फिर से , बची थी नींद हमारी , वो भी हमसे आज रूठ गयी हमसे।

रातें भी खफा हो जाती है ये आज मालूम पडा, कैसी बेवफा निकलीं ये रातें हमे आज मालूम पडा, ये नींद क्यों हमसे रूठ गयीं, सपनो के चक्कर मे आज नींद भी टूट गयीं।

कुछ बेवफाओं से नाता टूटा था, आज रातें भी बेवफा हो गयीं । सोचा था चैन से सो जाऊँगा, मगर ये रातें हमे बैचैन कर गयी।

सपनों के साथ साथ हमारी नींद भी टूट गयीं, ये रात भी आज बेवफा निकल गयीं।

©#अमरेश गिरि