उजाले का ठेकेदार
उजाले का ठेकेदार निंद्रा त्यागकर चलता है,अपने पथ पर सजाकर लड्डू की थाल।
उषाकाल में बिखेरकर अपने तेज को, जग उजाला कर जाता है।
इठलाती दोपहरी को परोसकर लड्डू , पल-पल पग बढ़ाता है।
सांझ काल में थककर,ठेकेदार स्वर्ण मुकुट धारण कर अपने सिंहासन पर लेट जाता है।
©अमन कुमार(विक्की)
