Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·

ताराचण्डी

तारा चंडी का है, आशीर्वाद। उनके द्वार हूं, बिना पता। मै चलता जा रहा हूं, तलाश में।

छटा प्रकृति की, टकटकी लगा। आ पहुंचा, मां चंडी के चरणों में। बिना पता, चलता जा रहा हूं।

अतुलनीय मां की कृपा, खींच ला रही है। तू चल बस, पा जाएगा अपना वजूद। प्राकृति मां का आंचल, प्रेरित करती है।

मत कर फिक्र तू, पहचान मुझे। तू बस चलता जा, हो समर्पित। कर अर्पण तू, श्रद्धा जीवन अपना।

आ जा बस महसूस कर, मै तुझे ढूंढ रही। आ जा बस, लिपट जा मेरी आंचल में। जैसे तारा चंडी की पुकार, खुद खींच रही है।

तारा चंडी का है, आशीर्वाद। उनके द्वार हूं, बिना पता। मै चलता जा रहा हूं, तलाश में।

मंजिल दूर नहीं है।

#ताराचण्डी

©#मिथिलेश कुमार