इंटरनेट का उपयोग
दोस्तों हम महसूस करना भूल चुके हैं। फेसबुक, वाट्सएप का रंग बिरंगा माहौल हमें उस रंग का परिचय नहीं दिलाता जो हमारा अपना है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति कई घंटे इस बात को देखने में बिता देता है कि किस पोस्ट पर क्या कमेंट, कितने लाइक आ रहे हैं, दूसरों ने कैसी फोटो अपलोड की है तथा हमारी कैसी है, मनोरंजन नहीं हो रहा तो चलो सोशल मीडिया पर पहुंच जाओ।
इंटरनेट का सर्वोत्तम उपयोग तभी है जब हम उसे अपनी आत्मिक प्रगति का साधन मानें। यदि ऐसा न हो तो जिन वेबसाइटों में आज देश अपना समय खर्च कर रहा है वे हमें कई चेहरे दे सकती हैं पर अपने आप के करीब जाने के लिए एकाग्र होना होता है।
इंसान की जिंदगी मौज करने के लिए नहीं मिली है। इसका एक महान आध्यात्मिक लक्ष्य है। उपनिषदों में वर्णित श्रेय मार्ग पर चलने के लिए संसार से कटना नहीं परन्तु उसकी सभी परिस्थितियों में अपनी आत्मा के दर्शन करने होते हैं। आत्मा पूर्ण है इसलिए संसार में क्रियाशील रह भी लिप्त नहीं होती।
मन अधूरा है, बंटा है, अविकसित है तो भटकना जानता है परन्तु वही मन अपने आप को पहचानने का साधन भी हो सकता है। इसके लिए हमें सुधार करने से हिचकना नहीं होगा। उदाहरण के लिए जिस समय हम भोजन कर रहे हैं यदि टीवी ऑन न भी हो, खाने में कोई ऐसी बात न भी हो जिसके हम इच्छुक हैं, शांत चित्त हो भगवान को नमन कर उसे ग्रहण किया जाए तो वह जिस मन का निर्माण करता है वह उत्कृष्टता संपन्न होता है।
यदि यही क्रिया अस्त व्यस्त मन से की जाए तो वह भोजन मात्र पेट पूजा ही रह जाती है। जब हम भगवान की बात करते हैं तो कई लोग सोच सकते हैं कि कौन सा भगवान, उसका रंग रूप, वह कहां रहता है आदि। भगवान वह है जिसके समक्ष हम झुकते हैं। इस प्रकार यह सम्पूर्ण अस्तित्व ही भगवान है।
वह हमारे स्वार्थ हेतु नहीं परंतु यदि कुछ लेने नहीं देने के भाव से इस दुनिया को देखा जाए तो हम उस सुख, शांति, प्रेम के सागर में प्रवेश करते हैं जो हमारे ह्रदय में ही है। आज व्यक्ति वही करता है जिसमें उसका स्वार्थ छिपा है। उसके स्वार्थ की दिशा परमार्थ में भी बदली जा सकती है। आत्म सुधार से बड़ा परमार्थ क्या हो सकता है।
© सिद्धार्थ राणा
