Narendra Prasad Nirala
Narendra Prasad NiralaCourseLiteraturePoetry
4 Apr 2025·1 min read·1·

अहंकार की दीवारें

दो दिल थे तैयार, जीवन संग चलने को, पर रुक गई राहें, कुछ रिश्तों के तकरार में। ना लड़की ने ना लड़के ने इनकार किया, फिर क्यों उलझा विवाह, इस झूठे स्वाभिमान में?

एक ओर पिता बोले — "हम कम नहीं किसी से!" दूजे ने कहा — "झुकेंगे नहीं किसी के आगे!" इच्छाएं बच्चों की, दब गईं इन दंभों में, प्रेम की बातें खो गईं, आदर की गूंज में।

जहाँ होना था मंगलगीतों का शोर, वहाँ छा गया मौन, जैसे टूटा हो कोई जोर। बेटी की आँखों में सपनों की नमी थी, बेटे की चुप्पी में भी पीड़ा कहीं छिपी थी।

क्या रिश्तों को जोड़ने से बड़ा होता है ‘मैं’? क्या अहं की आग में जल जाए सारा जीवनधन? यदि दोनों घर मिलते, थोड़ी विनम्रता से, तो आज रचता कोई सुंदर सा बंधन।

वक़्त तो निकल जाएगा, पर रह जाएगी टीस, कि दो परिवार बन सकते थे एक अद्भुत पीस। सोचो ऐ पिता, न टूटे बच्चों की डोरी, कभी-कभी झुक जाने में भी छिपी होती है पूरी जीत की कहानी।

© योगाचार्य नरेन्द्र प्रसाद 'निराला’