Gopal Kumar
Gopal KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·3 min read·

नेता और भगवान !

इस देश में कुछ समझ में आये ना आये पर भगवान् और भक्ति पर सबकी समझ बहुत ही गहरी है! इतनी गहरी है कि जैसे ही कोई नेता अपने कार्यो या किये गए वादों पे कुछ हद तक सही उतर जाए या कोई बहुत बड़ा जुमला फेक कर यह यकीन दिला दे कि हम आपके उद्धार करने के लिए ही अभी अभी कल्कि अवतार ले के आये है "हड़प्पा सभ्यता " से होते हुए , इतना सुनते ही हमलोग मंत्रजाप और आरती करने लगते है और फिर हम उसे अपनी अनोखी भक्ति भाव से सराबोर करते उसे एक उद्धारक भगवान के रूप में अपने श्रद्धा भाव से जोड़ के ऐसे जगह बैठा देते है कि कुछ दिन बाद वो हम से ही हमारे अस्तित्व पर सवाल खरा करने लगता है !

इसके बाद जब ये भगवान कुछ समय पश्चात अपने पथ से भटक जाते है तो फिर हमें बोलने में बहुत झिझक होती रहती है खुद के द्वारा माने गए भगवान पे सवाल खरा करने से क्योंकि हमें बचपन से ही सिखाया जाता है "पथ" का सही होने का निर्धारण ही इसी बात से होता है कि हमारे भगवान किस "पथ" पे चलते है ! मतलब भगवान का पथ गलत होने का सवाल ही खरा नहीं होता ! और हमारी संस्कृति में तो भगवान् से सवाल करने वाले को अधार्मिक या तो पागल करार देने कि बहुत ही कूल प्रथा रही है !

फिर सबकुछ गड्डमगड होते हुए देखने के बाद एक दिन अचानक फील होता है कि ये गलत भगवान चुन लिया था फिर से नयी भक्ति अध्याय की शुरुआत की जाए और इसी अद्भुत समझ के आधार पर हम गौ मूत्र से कोरोना वायरस का एंटीडोट भी बना लेते है और शिकागो वाले भाषण को याद कर कर के आत्ममुग्ध भी होते रहते है ! चाहे मोदी हों या केजरीवाल या अलग अलग पार्टी के कर्णधार परन्तु हम उन सभी को भगवान और भक्ति के कांसेप्ट से दूर क्यों नहीं रख पाते है ?? नेता को सिर्फ नेता ही क्यों नहीं रहने देते ??

पता नहीं इस रहस्य का कारण क्या है , हों सकता है कि हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र , लोकतंत्र चिल्लाने के शोर में लोकतंत्र के "लोक " को समझने की जरूरत न समझी हों.... या तो हों सकता है कि हमारी भगवान और भक्ति की कॉन्सेप्ट इतनी गहरी है कि इसके आगे कोई भी समझ आकार लेने से पहले ही निराकार हों जाता हो.....!

इसका मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि सभी नेता के बारे में मान लेना चाहिए कि सब नेता एक जैसे होते है ! कहने का मतलब सीधा सा है कि नेता के द्वारा आपके लिए किये गए कार्यो से सिर्फ मतलब रखिये जब तक आपके समाज और घर तक उनके कामो का छाप दिख रहा है तब तक ही उसके बाद संविधान और लोकतंत्र में भरोसा रखिये ! अपने भगवान को बेशक पूजिये परन्तु नेता को भगवान बना के लोकतंत्र का खिल्ली मत उड़ाइयें ! पूजा ही करना है तो आप अपने राम और हनुमान की कीजिये "बीजेपी" की राम और "आप " की हनुमान की नहीं ! अगर "बीजेपी" और "आप " को तुलना ही करना है तो बेशक उनके कार्यो का कीजिये !

एक और बात का ख्याल रखना बहुत ही जरुरी है कि अपने भगवान को घर से बाहर मत निकालिये अगर आप अपने भगवान को निकाल कर रोड पर आप "उछालने" या "उछलने" लगे तो वो दिन दूर नहीं कि पुरे देश में आपके आराध्य देवी देवता के नाम से सारे कुकृत्य होने लगेंगे ! जिसकी शुरुआत अभी अभी JNU से होकर गार्गी कॉलेज तक पहुंच चुकी है ! आपको पता होगा ही कि आपके पुरषोत्तम राम के नाम के साथ कैसे कैसे "उत्तम" प्रयोग किये जा रहे इसका सबसे लेटेस्ट उदाहरण है गार्गी कॉलेज बाकी आगे आपकी मर्जी......

जो भी हों परन्तु भगवान् और भक्ति के बारे में एक बार फिर से सोचने कि जरूरत तो है ही क्योंकि याद है ना दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और अपने विवेका जी का शिकागो वाला वादा(1893) नहीं तो दुनिया वाले हर वैलेंटाइन डे पर पूछेंगे कि -

"""क्या हुआ तेरा वादा....................??