Mithilesh Kumar
Mithilesh KumarCourseLiteraturePoetry
3 Feb 2021·1 min read·1·

ईश्वर की तलाश

आंख मूंदे, हाथ जोड़े, चिंतन में। ईश्वर कहां तू रे, खोल आंख ढूंढ़ता खुद को। पाता अकेला, बिल्कुल शांत।

छू छू है छूछूंदर की आवाज, गूंजती बार बार। बैठा बस हूं, अकेला बैठा तन्हाई में। शांत कुछ ज्यादा ही, बैठा अकेला ठूंठ रहा ईश्वर को।

लगा लू दिल अपने ईश से, यही है भूल। कर तू दिल लगी, इस ईश्वर की कृति से। इनकी रचना से, भोग इस खूबसूरत दुनिया को।

अकेलापन दूर होगी, फैलेगी चहुंओर कोलाहल। लग जा तू, अपने दुनियादारी में। झोंख खुद को, जीवन की भागदौड़ में।

अकेलापन रहेगा ना पास, ले जिम्मेवारी। इस विश्व की, शांति हो कायम। शांति ज्यादा भी घातक है।

लग जा अपने लक्ष्य, बनाने खुद को। प्रेरित कर खुद को, तप कर, बड़े लक्ष्य की। सोच बड़ा, कर उससे भी बड़ा।

ध्यान लगा अपने कर्म पर, ईश्वर तो सबके पास है। पहचान इसे, लगा दौर जितने कि, पाने की सब। जि ले भरपूर, इस प्रकृति की रचना को।

आंख मूंदे, हाथ जोड़े, चिंतन में। ईश्वर कहां तू रे, खोल आंख ढूंढ़ता खुद को। पाता अकेला, बिल्कुल शांत।

#worldly

©#मिथिलेश कुमार