हिंदी के लिए हम कब खड़ें होंगे...
बहुत जल्द एक बार फिर से हिंदी दिवस आ जाएगा हमलोग खुशी-खुशी हिंदी दिवस मना लेंगे और अपनी ही पीठ थपथपा लेंगे।लेकिन हिंदी कैसे और मजबूत हो, कैसे यह पूरे देश की भाषा बने इस पर एक बार फिर से विचार करने की जरूरत है।
भारत के बारे में कहा जाता है कि यह विविधता में एकता का देश है, और दूसरी एक कहावत है जिसमें कहा जाता है कि हर तीन कोस (1 किमी) पर पानी बदल जाता है और हर तीन कोस पर वाणी (बोली) बदल जाती है। इतनी विविधता होने के बाद हम भारत को हिंदी के साथ कैसे जोड़ सकते हैं इन सभी बिंदुओं पर हमें एक बार फिर से ठहर कर सोचना होगा।
हमें सोचना होगा कि क्या एक दिन हिंदी दिवस मना लेने से क्या हम हिंदी को आम जन की भाषा बना पाएंगे। एक दिन हम हिंदी दिवस मना लेंते हैं और बाकि 364 दिन हम अग्रेंजी को ही तरजीह देते रहते हैं।
अगर हम पूरे विश्व में हिंदी कि स्थिति को देखे तो हम तीसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा की श्रेणी में आते हैं। लेकिन हमने कभी यह सोचा है कि क्या अपने ही देश में हिंदी की क्या स्थिति है ? क्या हिंदी अपने देश में उतनी मजबूत स्थिति में है जितनी दूसरी अन्य भाषाओं अपने देश में हैं।
इतना ही नहीं, देश को अपनी कोई भाषा नहीं होने के कारण कई अंतर्राष्ट्रीय पटल पर लज्जा का सामना करना पड़ेगा। कितना अच्छा है न जब हम अपने-अपने ऑफिस में हिंदी पखवाड़ा मना लेते हैं और हिंदी के विकास के बारे में सोच लेते है,विचार कर लेते हैं ।
लेकिन जैसे ही व्याख्यान माला वाले कमरे से बाहर निकल कर आते हैं हम उन सभी बिंदुओं को भूल जाते हैं जो हमने उस कमरे में सुने थे,उस पर विचार किए थे। हमें यह सोचना होगा कि हम हिंदी को आम जन की भाषा कैसे बनाएं। उसे सोचने और कागजों तक ही सीमित न रखे इसे जमीन पर भी उतारें।
अंग्रेजी के खिलाफ लड़ाई में हिंदी अकेले कुछ नहीं कर सकती है। जिस तरह लकड़ी का एक डंडा आसानी से टूट सकता है उसी तरह से हिंदी अंग्रेजी के सामने अकेले पड़ जाती है। इसीलिए हमें अपनी विविधता में एकता का परिचय देने का समय आ गया है। हमें तमिल, तेलगू, मराठी, उड़िया, बांग्ला जैसे बंधन को तोड़कर आगे आना होगा तब हम एक संपूर्ण हिंदी की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
कितना अच्छा होता बिहार के स्कूलों में मराठी की पढ़ाई होती और तमिल के स्कूल में बच्चें बांग्ला के साथ हिंदी भी पढ़ रहे होते। मुझे याद है जब मैं मास्टर (MA) की पढ़ाई के लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में गया था। हमें अपने कोर्स के अलावा यह हिदायत दी गई थी कि आप अपनी मातृभाषा के अलावा एक अलग भाषा की पढ़ाई करेंगे।
उस समय तो हम सभी दोस्तों को यह बुरा लगा था कि यह क्या बकवास है। लेकिन इसका महत्व वहां से निकलने के बाद हमें पता चला। जब आप एक नई भाषा के बारे में जानते हैं, आपको उसके साहित्य के बारे में पढ़ने को मिलता है जिससे आप औरो से अलग हो जाते हैं।
खैर अब इस तरह की परिपाटी वहां भी लगभग समाप्त हो चुकी है क्योंकि वहां भी छात्रों को कह दिया गया है कि आप इस तरह के विषय ले सकते हैं या नहीं भी ले सकते हैं। यानि यह वैकल्पिक है अनिवार्य नहीं।
अब हमें यह करना है कि हम हिंदी को "यूज टू" में कैसे लाए। आजकल हम सोशल मीडिया पर अपने खाली समय का सबसे ज्यादा समय खर्च करते हैं तो हम हिंदी में ही वहां लोगों से बात करें। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैंने पत्रकारिता शुरू करने के लिए टाइपिंग सीखा था और फेसबुक पर दोस्तों को हिंदी में मैसेज करता था लोग बहुत ही खुश होकर कहते थे तुम् हिंदी में कैसे टाइप कर लेते हो।
सच बताऊं मेरे कई दोस्त इससे कापी इंप्रेश हुए थे। आप भी हिंदी में एक बार लिख कर देखिए अपने लिए न सही हिंदी के विकास के लिए आप कुछ करिए। अब यह जिम्मा आपको और हमको उठाना होगा। हमारे बुजुर्गो ने हमारे लिए एक आधार बना दिया है हमें उसे लेकर ऊपर जाना है।
हिंदी के विकास में एक महत्वपूर्ण योगदान हिंदी सिनेमा का भी है। लेकिन हिंदी को बचाने के लिए हमें सिनेमा और हिंदी में कमेंट्री कर देने और सुन लेने भर से कुछ नहीं होगा। हमें हिंदी के शब्दों को बचाना होगा। उसे गढ़ना होगा। उसका संरक्षण करना होगा। जब तक हम नए हिंदी के शब्द नहीं गढ़ेंगे तब तक हम हिंदी के बचाव मे बहुत कुछ नहीं कर सकते हैं। ऐसे में हमें हिंदी के लिए नए शब्द बनाने होंगे।
हिंदी को व्याकरण की परिपाटी से बाहर आना होगा हमें गैर-हिंदी भाषी लोगों के द्वारा बोली जाने वाली हिंदी को भी स्वीकार करना होगा। हम आज भी यह कहने की लड़ाई में है कि उसकी हिंदी खराब है, उसकी हिंदी अच्छी है ऐसे में हमें यह ध्यान देने की जरूरत है कि बह हिंदी को कितना समझ पा रहे हैं।
जब मैं विश्वविद्यालय के दिनों में था तो हमारे मराठी दोस्त कहते थे कि पुणे की मराठी सबसे अच्छी है। लेकिन मैं जब मराठी बोलता था तो वे खुश होते थे कि यह भी मराठी बोल रहा है हमें इसी तरह हिंदी को आगे बढ़ाना है और हिंदी को समृद्ध करना है। हम हिंदी पखवाड़ा और एक दिन हिंदी दिवस मना कर कुछ नहीं कर सकते। हमें हिंदी से प्यार करना होगा...
©#रत्नसेन
