गर अब खुशियों का मेला हैं
गर अब सपने आते रातों को / तो हमने दिन में रात उधेड़ा भी हैं ! / गर अब खुशियों का मेला हैं / तो कल हमने ही सब झेला भी हैं ! <!--more-- जब सबने मिल बारात निकाली उत्साहित सी / तब हमने पूरी रात निकाली स्याह अमावस की, / दर्द सहे तो दर्द कहेंगे यूँ ना अब चुप ही रहेंगे / पूर्णमासी के आने तक क्या अमावस को कुछ न कहेंगे। / गर कल का दर्द उकेरा हैं / तो हमने ही संग ठेला भी हैं ! / गर अब खुशियों का मेला हैं / तो कल हमने ही सब झेला भी हैं !
उसके कहने सुनने की हर एक बात निराली हैं / जब दिल ठोकर खाएं तो फिर श्यामपट्ट सी काली हैं, / उसके पढ़ लिख, लिख पढ़ने को एक समझ ना आती हैं / पर नैराश्य निष्प्राण जीवन को कल-कल से वो भाती हैं ! / कुछ बातों पर हंसे है खुलकर / तो कुछ बातों पर रोया भी हैं ! / गर अब खुशियों का मेला हैं / तो कल हमने ही सब झेला भी हैं !
©#कुमार
