अलविदा काशी
अलविदा है, सांस्कृतिक धरोहर काशी को। अस्सी घाट को, घनी आबादी, वहां के मंदिरों को। इसकी कसीस ऐसी की, पुरानी यादों का घरौंदा। आधुनिकता व आध्यात्मिकता की डुबकी लगाते। हिचकोले खाते, घबराहट इतनी भीड़ से।
अगले गंतव्य की ओर, प्रस्थान नहीं तो क्या। हमारी शहर फिसड्डी है,बढ़ती जरूरतों के सामने। बढ़ती ट्रैफिक चिंता का कारण, जनसंख्या विस्फोट भी। संरक्षित करे, इस प्राकृतिक व धार्मिक धरोहर को।
अलविदा है, सांस्कृतिक धरोहर काशी को। शानदार दीखती काशी नगरी, न्यारी भी। ट्रैफिक की दिक्कत झेल रही, तंग गलियां भी फैल रही। विकास के साथ साथ चलना, शहरों की है पुरानी समस्या।
आध्यात्मिक नगरी को सलाम, अलविदा तुझे। फिर मिलते है, नई यादों को संजोए, वाराणसी गौरव के साथ। सलाम तुझे, हम तो बस चलते है।
बार-बार जरूरत होती, जैसे कोई रिश्ता हो। हरदम नई लगती, वाराणसी। आध्यात्मिकता में, डुबकी लगाते सभी, सांस्कृतिक धरोहर काशी को।
#वाराणसी
©#मिथिलेश कुमार
