
स्वतंत्र राष्ट्र
आर्यावर्त का विस्तृत भूखंड, तीन रंग से शोभायमान हुआ।
रणबाकुरों के अमिट कहानियों के स्वर, धरा-अंबर तक गुंजायमान हुआ।
गढ़ने को स्वर्णिम दास्तान राष्ट्र का, जन-जन का आह्वान हुआ।
अब न थमने पायेंगें बढ़ते पांव हमारे, सारे जहां में एलान हुआ।
भूल न सकेंगें उन सपनों को, जिन्हें आँखों में सजा, माँ का अगणित लाल कुर्बान हुआ।
आओ नई रौशनी को संग लिए नव सृजन की ओर चले।
उन बाजुओं को थाम दें, जो बेबस और लाचार को छले।
उठती झोंपड़ियों से, क्रंदन मिटाने को चले।
जो डूबा है अज्ञानता के तम में, उस ओर ज्ञानदीप जलाने को चले।
जो तेजपूंज युवा सामर्थ्य बैठी हताश, उन धमनियों में सद्क्रान्ति जगाने को चले।
दीमक बन जो कर रहे खोखला, उन्हें जड़ से मिटाने को चले।
सूप्त पड़े संवेदना को जगा, भावना प्रवाह सजाने को चले।
प्रस्फुटित कर राष्ट्र चेतना हृदय में, आर्यावर्त को विश्व सिरमौर बनाने को चले।
जागृत हो चेतना इस कदर हर मनुज में, मानवी उत्थान का सर्वोच्च शिखर पाने को चलो।
स्वतंत्र राष्ट्र का सही अर्थ बताने को चले।
स्वतंत्र धरा, स्वतंत्र गगन, स्वतंत्र अपना उपवन,
हम सब मिल श्रृंगार करें, धरा पर अद्वितीय जो अपना चमन।
जो स्वयं हो तेजपूंज जगत् का, उसे कोई क्या दिखायेगा दर्पण।
आप समस्त देशवासियों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं अनन्त बधाई।
© सतीश कुमार पाण्डेय