Rahul Devashish

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3 Feb 2021·3 min read·13

लोग इतने परेशान क्यों है ?

पिछली कड़ी में हमने "साधन में सुख नहीं है" से अपनी बात ख़त्म की थी। इस अंक में हम साधन को समझने का प्रयास करेंगे। साधन का अर्थ संसाधन है । <!--more--जैसे-मानव संसाधन(Human Resources), प्राकृतिक संसाधन (Natural Resources), इत्यादि। साधन जुटाने का और उससे सुख प्राप्त करने का प्रयास हम आजीवन करते रहते है।

एक बच्चा अपने लिये खेल का सामान जुटाता है। उन खिलौनों से वह खेलता है। कुछ समय तक खिलौने से खेलने के बाद वह बोर हो जाता है और फिर अपने खिलौने बदलता है या बदलने की इच्छा करता है।ये खिलौने प्राकृतिक संसाधनों से निर्मित कृत्रिम संसाधन है।

बच्चा जब बड़ा होता है तो अपने दोस्तों को जुटाता है। ये दोस्त उनके मानव संसाधन है। यारी, दोस्ती के बाद शादी करना , बच्चे पैदा करना ये मानव संसाधन को जुटाने का प्रयास है। शादी और बच्चे के बाद लोगों से जान-पहचान बनाना , उनसे व्यावसायिक रिश्ते इत्यादि बनाना भी मानव संसाधन को जुटाने का प्रयास ही है।

प्रॉपर्टी जुटाना यानि जमीन-जायदाद , मकान-दुकान, गाड़ी, आदि खरीदना ,भविष्य के लिए युक्ति बनाना ये प्राकृतिक संसाधनों को जुटाने का प्रयास है।

बच्चे में और बड़ों में ज्यादा भेद नहीं है। दोनों अपनी ख़ुशी के लिये ही ये साधन जुटाते है। लेकिन कुछ समय तक खेलने या भोगने के बाद इन संसाधनों से वे बोर हो जाते है। इन्हें बदलने का वे प्रयास करते है। ये बदलाव का काम अपनी क्षमता के अनुसार वे पूरा करते है। यदि बदलाव नहीं कर पाते है तो वे निराश हो जाते है।

दरअसल, साधन में हमारे स्थूल शरीर को सुख देने की योग्यता है। स्थूल शरीर और संसाधन में समानता है। स्थूल शरीर प्राकृतिक तत्वों से बना हुआ है। जीव विज्ञान के जानकर बताते है कि हमारा स्थूल शरीर विभिन्न रसायनों का समुच्चय है। शरीर में इन रसायनों के असंतुलन से बीमारियाँ पनपती है। इन बिमारियों को ठीक करने के लिये डॉक्टर दवाई के रूप में रसायन डालते है। कभी-कभी हमारे शरीर के और इन दवाइयों में रिएक्शन होता है। इनसे हम समझ सकते है की हमारा स्थूल शरीर विभिन्न रसायनों का पुंज है। ये रसायन प्राकृतिक संसाधन है।

स्थूल शरीर की निर्माण तिथि (Manufacturing Date) एवं समाप्ति तिथि (Expiry Date) होती है। निर्माण तिथि स्थूल शरीर का जन्मदिन है और समाप्ति तिथि इसका मृत्यु दिवस है। जो जन्म लेगा वो मरेगा यह सत्य है। शोरूम से कबाड़ी तक का सफर हर गाड़ी को पूरी करनी पड़ती है। प्रसूति कक्ष से शमशान तक का सफर हर स्थूल शरीर को करना पड़ता है। स्थूल शरीर जन्म तथा मृत्यु को धारण करता है। जो धारण किया जाता है वह धर्म है- "धार्यते इति धर्म:"।

इस प्रकार हर स्थूल शरीरधारी अपने-अपने शारीरिक धर्म से जुड़ा हुआ है। यानि हर शरीरधारी धार्मिक है। ठण्ड के मौषम में सर्दी लगना , गर्मी के मौषम में पसीना बहना, बारिस में भीगना ये सारे उन ऋतुओं के धर्म है। ये पूरी सृष्टि धर्म के स्तम्भ पर चल रही है। सूर्य का धर्म है रोशनी और ऊष्मा देना , चन्द्रमा का धर्म है शीतलता प्रदान करना। ये अपने धर्म को छोड़ दे तो सृष्टि खतरे में पड़ जाएगी। शरीर अगर ताप, ठण्ड, भूख , प्यास आदि को महसूस करना छोड़ दे तो वो मृत हो जायेगा।

ये था धर्म के पीछे का दूसरा राज। जिसमें हमने जाना धर्म क्या है। अगले अंक में हम धर्म के स्वरुप को हम जानेंगे। जानते रहिये-"धर्म के पीछे का राज "।

©#राहुल देवाशीष

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