Rahul Devashish

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8 Feb 2021·3 min read·1

देवी-देवता और लोग

वैदिक शास्त्रों में उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर अब तक भगवान के इक्कीस अवतार हो चुके हैं । ये अवतार क्रमशः कुमारगण, वराह , नारद , नर-नारायण, कपिल, दत्तात्रेय, यज्ञ, ऋषभ, पृथु, मत्स्य, कच्छप, धन्वंतरि, मोहिनी, नरसिंह, वामन, भृगुपति , व्यासदेव , राम , बलराम, कृष्ण एवं बुद्ध के रूप में हुए है। बाईसवाँ अवतार कल्कि के रूप में होने का उल्लेख है।

इन अवतारों ने अलग-अलग कार्य सम्पन्न किया है जिसके बारे में हम सभी थोड़ा बहुत जानते है। अतः इस लेख में हम उन कार्यों की चर्चा नहीं कर रहे है। ये अवतार हुए , अपना काम किये और चले गए।

हम लोग यह भी जानते है कि इन अवतारों के पहले एवं बाद में वर्त्तमान में मौजूद सारे देवी-देवता हमारे समाज में मौजूद थे और आज भी मौजूद हैं । ये देवी-देवता सनातन हैं । सनातन का मतलब है जिसका उद्गम ज्ञात नहीं है।

इन सनातन देवी-देवताओं की वैलिडिटी कभी ख़त्म नहीं होती है। जिनके घरों में मूर्तियां है उन्हें बार-बार रिचार्ज नहीं कराना पड़ता अपने मोबाईल के कार्ड की तरह। ये देवी देवता अहर्निश अपनी सेवा देते रहते है। चौबीस घंटे में जब भी इन्हें बुलाएँगे ये आकर आपका काम करेंगे।जिस प्रकार आपदा प्रबंधन और सुरक्षा के जवान करते है।

इन देवी-देवता के कार्य करने के पूर्व इनकी कुछ शर्ते होती है जिसे अनिवार्य रूप से पूरी करनी पड़ती है। जैसे इन्हें कुछ स्पीड पैक देना पड़ता है , जिस प्रकार अधिकारियों से किसी आकस्मिक काम करवाने के लिए स्पीड मनी देनी पड़ती है।

हर देवी-देवता के अलग-अलग स्पीड पैक मेनू है। कोई वेज है तो कोई नॉन-वेज। किसी को फूल-पत्ते चाहिए तो किसी को पुड़िया। किसी को कपडे चाहिए तो किसी को मिठाइयाँ। सामान्यतः सभी देवी-देवता का अपना पसंद-नापसंद है।

ये देवी-देवता अपने-अपने भक्तों की मन्नतें पूरी करते है।वे थोड़ा-बहुत चढ़ावा लेते , कुछ मंत्र पढ़वाते, कुछ पूजा-पाठ करवाते , थोड़ा अनुनय-विनय करवाते फिर हमारा काम कर देते है।

जो नास्तिक है उन्हें देवी-देवताओं की कभी जरुरत नहीं पड़ती। अपने कर्मयोग से वे फल उगाते है और उन फलों से वे सफल होते रहते है। खाओ , पीओ और जिओ पॉलिसी पर उनकी लाईफ चलती रहती है।

इस प्रकार हम देखते है आस्तिकों (देवी-देवता के भरोसे जीने वाले ) एवं नास्तिकों की लाईफ ओके-ओके है।अगर जिन्दगी ठीक-ठाक चल रही है तो देवी-देवता की जरुरत नहीं है। कुछ संकट आया तो देवी-देवता है ही संकटमोचन के लिए।

तो यह सवाल उठता है कि फिर ये अवतार क्यों होते है ? जब देवी-देवता और नास्तिक लोग मिलकर समाज को भली-भांति संभाले हुए है तो भगवान को बार-बार अवतार लेने की क्या जरुरत है? अवतार लेकर भी भगवान ने आम-जनता के लिए तो ज्यादा-कुछ किया नहीं ?

राम के रूप में अवतार लिये तो अपनी पत्नी के लिए रामायण युद्ध करवाया। कृष्ण के रूप में अवतार लिए तो भाई-भाई के बीच महाभारत का युद्ध करवाया। बुद्ध के रूप में आये तो भी कौन सा अच्छा काम किया। खुद के राजा बनने के कैरियर को छोड़ दिया, बीवी, बच्चे छोड़ दिए, सिर मुंडवा लिये और ‘बुद्धम शरणम, धम्मम शरणम्’ करते हुए भीख मांगने निकल पड़े।

रिलेक्स ! भगवान इन छोटे कार्यों के लिए नहीं आते है। अतिमानवीय कार्य करने के लिए वे अवतार लेते है। जो काम देवी-देवताओं और नास्तिकों से नहीं हो पाता वो काम भगवान स्वयं आकर पूरा करते है।

भगवान जब अवतार लेते है तो ये देवी-देवता उनका सहयोग करते है। जब भगवान राम के रूप में अवतार लिए थे तो शिवजी ने हनुमान का रूप लेकर उनकी मदद की थी। हनुमान जी राम-नाम लेते थे , दास भाव से उनकी सेवा करते थे। यह प्रमाणित करता है कि देवी-देवता भगवान के सब-ऑर्डिनेट है।

देवी-देवता भगवान के कार्य में उनका सहयोग देने के लिये है। देवी-देवता अपने-अपने डिपार्टमेंट के हेड है। भगवान सभी डिपार्टमेंट्स के हेड है। जिस प्रकार महामहिम राष्ट्रपति के नियंत्रण में देश की सरकार के तीनों अंग -विधायिका , कार्यपालिका एवं न्यायपालिका काम करते है ठीक उसी प्रकार भगवान के नियंत्रण में सारे देवी-देवता काम करते है।

अगर ये देवी-देवता भगवान होते तो भगवान को अवतार नहीं लेना पड़ता। भगवान बॉस है और ये देवी-देवता उनके कर्मचारी।

हरे कृष्ण ! © राहुल देवाशीष

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