
mahabharat dialoge1
00:01 आँखे देखे मौन मुख, सहा कहा नहीं जाए। लेख विधाता का लिखा, कौन किसे समझाए, कौन किसे समझाए।। 00:40 वचन दिया सोचा नहीं होगा क्या परिणाम। सोच समझकर कीजिए जीवन में हर काम।। 01:51 आस कह रही श्वास से, धीरज धरना सीख। मांगे बिन मोती मिले, मांगे मिले ना भीख, मांगे मिले ना भीख।। 02:27 शत्रु धराशाही हुए ज्यूँ आँधी के आगे। है ये गंगा पुत्र का, पहला ही संग्राम ।। 04:31 हे अपराधी भावना मृत्यु कामना मूल। गया अग्नि रथ रहे गए शेष चिता के फूल।। 05:30 क्रुद्ध सर्पिनी बन गई, सुंदर उपवन बेल। दोष किसी का क्या भला, भाग्य खेलाए खेल।। 06:32 माता यह संभव नहीं भीष्म करे व्रत त्याग। हे शीतल सूर्य हो, बरसे शशि से आग।। 07:05 जीवन दाता एक है समदर्शी भगवान, जैसी जिसकी पात्रता वैसा जीवन दान, वैसा जीवन दान। तमस रजस सद्गुणवती माता प्रकृति प्रधान, जैसी जननी भावना वैसी ही संतान, वैसी ही संतान ।। 09:07 दे हस्कर वर को विदा, वीर वधू की रीत। राजधर्म की नीति ये, क्षत्राणी की प्रीत।। 09:36 दे अशीष ऋषि देव ने तुम्हें सदा वरदान। गोद भरे जुग जुग जिये भाग्यवंत संतान।। 10:48 समय भूमि गोपाल की भूले जब संसार। धार सुदर्शन चक्र की हरे भूमि का भार।। 11:14 नारी तेरे दुःख में नारायण दुःखमंत। रो मत तेरी खोख में आएंगे भगवंत।। 12:05 कृष्ण पक्ष की अष्टमी अर्धरात्रि बुधवार, कारागृह में कंस के भयो कृष्ण अवतार, भयो कृष्ण अवतार। 15:25 चली कुमारी नंदिनी, आए नंद कुमार। त्याग बिना संभव नहीं, जीव जगत उद्धार, जीव जगत उद्धार।। 15:58 अत्याचारी कंस की कुमति बनी तलवार। अंत तुझे खा जाएगा तेरा अत्याचार।। 17:00 धीर धरो माँ देवकी, दिन न दूर सुख मूल। अश्रु बनेंगे जननी के कल्पलता के फूल।। 17:32 मनमोहन की मोहिनी, हरे अहम अभिमान। माया को मोहित करें, मोहन की मुस्कान।। 19:00 पापी है दोनों असुर अहंकार अभिमान। दोनों का मर्दन करे तत्सदीय भगवान।। 19:28 गोवर्धन धारण करें लीलाधर बृजराज, मोर मुकुटधर, वेणुधर, गिरिधर बन गए आज, गिरिधर बन गए आज। 20:36 गो पृथ्वी वाणी किरण, गति मती माता ज्ञान। गौमाता को पूजकर, तिलक करें भगवान।। 21:10 मारक संहारक नहीं उद्धारक श्रीनाथ, सदगती पाई असुर ने, मर कर हरी के हाथ। 23:19 जन्म मरण के मध्य है, जीवन कर्म प्रधान। उज्ज्वल जिसका कर्म हो, जीवन वही महान, जीवन वही महान।। - माता ममता मूर्ति के, पंच पुजारी प्राण। माता का आशीष ही, पुत्रो का कल्याण।। 24:30 गुरुकुल गुरुकुल के प्रमुख, विद्या बुद्धि निधान। सद्गुण को ही सुलभ है, सद्गुण की पहचान।। 25:31 शिष्य सरल सतपत्र को, फलता है गुरुज्ञान। गुरु की राखे आन जो, रहे उसी की आन, रहे उसी की आन। 26:38 नवयुग का आरम्भ है, पाञ्चजन्य जयघोष, नाद सुजन परितोष प्रद, दुर्जन के प्रति रोष।